उज्जैन के प्रतिहारेश्वर महादेव कौन हैं?

प्रतिहारेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेव लिंगों में बीसवें हैं, जिनकी कथा स्कन्दपुराण के अवन्ती खण्ड में चतुरशीति लिंग माहात्म्य के अध्याय 20 में है। शिव के द्वारपाल नंदी को अग्नि के छल के बाद शाप मिलता है। वे महाकालवन में लिंग की पूजा करके मुक्त होते हैं।

प्रतिहार का अर्थ है द्वारपाल, यानी नाम का भाव है द्वारपाल के पूजे हुए ईश्वर। स्थानीय सूचियों में नाम प्रतिहारेश्वर लिखा मिलता है, और संस्कृत पाठ में प्रतीहारेश्वर (दीर्घ ई के साथ) है। यह लेख पूरे समय प्रतिहारेश्वर लेता है।

स्थानीय परंपरा में यह मंदिर पटनी बाजार के पास, नागनाथ की गली में नागचंद्रेश्वर मंदिर के परिसर में माना जाता है।

एक नज़र में

  • गणों के नायक नंदी शिव की देहली पर सजग खड़े रहते हैं।
  • अग्नि हंस का रूप लेकर द्वारपाल को छलने की सलाह देते हैं, और शिव नंदी को शाप देते हैं।
  • लोकपालों की सलाह पर नंदी कापालिक के वेश में महाकालवन के एक लिंग की पूजा करते हैं।
  • लिंग से आई वाणी उन्हें मुक्त करती है, और लिंग का नाम प्रतिहारेश्वर पड़ता है।

प्रतिहारेश्वर महादेव: संक्षिप्त तथ्य

विषय विवरण
नाम का अर्थ प्रतिहार (द्वारपाल) द्वारा पूजे गए ईश्वर
देवता शिव, लिंग रूप में
स्रोत पाठ स्कन्दपुराण, अवन्ती खण्ड, चतुरशीति लिंग माहात्म्य, अध्याय 20 (5.2.20)
84 महादेवों में क्रम बीसवाँ
कथावाचक और श्रोता शिव, पार्वती से कहते हैं
मुख्य पात्र नंदी, शिव के द्वारपाल

स्कन्दपुराण में प्रतिहारेश्वर महादेव की कथा क्या है?

टैगरे (Tagare) अनुवाद की अध्याय-टिप्पणी इसे यों समेटती है: शिव के द्वारपाल नंदी को पद से हटाया गया, पर इस लिंग की आराधना से वे अपने पद पर लौट आए। अध्याय की शुरुआत में शिव प्रतिहारेश्वर को बीसवाँ देव कहते हैं और बताते हैं कि दर्शन मात्र से मनुष्य धनवान हो जाता है।

अध्याय की पहली पंक्ति शिव के ये शब्द हैं:

प्रतीहारेश्वरं देवि विद्धि विंशतिमं प्रिये ।
यस्य दर्शनमात्रेण धनवानिह जायते ॥

अर्थ: हे प्रिये देवि, प्रतीहारेश्वर को बीसवाँ जानो; जिनके दर्शन मात्र से मनुष्य यहाँ धनवान हो जाता है (स्कन्दपुराण 5.2.20.1)।

सती, मंदर और चिंतित देवता

अध्याय सती के देह-त्याग से शुरू होता है। सती दक्ष पर क्रोध में देह छोड़ती हैं और फिर हिमाचल के घर जन्म लेती हैं। इसके बाद शिव और पार्वती मंदर पर्वत पर सौ दिव्य वर्षों से भी अधिक समय विहार में बिताते हैं।

इंद्र और अन्य देवता चिंतित हो उठते हैं कि इससे जो पुत्र जन्मेगा, वह तीनों लोकों को जला डालेगा। बृहस्पति सलाह देते हैं कि इस विहार को रोकने का कोई उपाय खोजा जाए।

देहली पर नंदी

देवता मंदर पहुँचते हैं। गणों के नायक नंदी देहली पर सजग खड़े हैं। अग्नि योजना रखते हैं: वे हंस का सुंदर रूप धरेंगे और द्वारपाल को छलकर शिव के पास जाएँगे। इंद्र और अन्य देवता द्वार पर ही रुके रहते हैं।

शाप

शिव का विहार रुक जाता है और देवता स्वर्ग लौट जाते हैं। तब शिव नंदी को शाप देते हैं: "तुरंत भूलोक जाओ।"

नंदी पुकार उठते हैं कि उन्हें अग्नि ने, और विशेषकर इंद्र ने, निश्चय ही छला है। वे पूछते हैं कि क्या उनसे पहले कोई बुरा कर्म हो गया था। पाठ शाप का कोई कारण नहीं देता।

महाकालवन और वाणी

दिशाओं के रक्षक लोकपाल उपाय के रूप में महाकालवन सुझाते हैं। नंदी वहाँ जाते हैं, कापालिक का वेश धारण करते हैं और विधि के अनुसार देव की पूजा करते हैं। लिंग से बिना शरीर की एक वाणी आती है: "हे द्वारपाल, तुम्हारी उत्तम भक्ति से शाप से मुक्ति हो गई।"

अशरीरसमुत्पन्ना वाणी लिंगात्तदा प्रिये ।
संजाता शापमोक्षस्ते प्रतीहार सुभक्तितः ॥

अर्थ: हे प्रिये, तब लिंग से बिना शरीर की एक वाणी उठी: हे प्रतीहार, तुम्हारी उत्तम भक्ति से शाप से मुक्ति हो गई (5.2.20.24)।

अंत में शिव कहते हैं कि तभी से यह देव प्रतिहारेश्वर के नाम से जाना जाता है।

स्कन्दपुराण के अनुसार प्रतिहारेश्वर महादेव की पूजा का फल क्या है?

अध्याय में ये फल गिनाए गए हैं:

  1. लिंग के दर्शन मात्र से मनुष्य यहाँ धनवान हो जाता है (आरंभिक श्लोक)।
  2. देव लोगों को मनचाहा फल देते हैं।
  3. पूजा करने वालों का अपने पद से वियोग नहीं होता और स्वप्न में भी उन्हें पद से हटना नहीं पड़ता।
  4. सात जन्मों के छोटे-बड़े पाप पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।
  5. मन में स्मरण करने पर परिवार के सभी लोग निश्चय ही स्वर्ग जाते हैं।

अध्याय का अंतिम श्लोक स्मरण का फल एक पंक्ति में कह देता है:

मनसा ये स्मरिष्यति प्रतीहारेश्वरं शिवम् ।
एवं तस्य कुलं सर्वं याति स्वर्गं न संशयः ॥

अर्थ: जो मन से प्रतिहारेश्वर शिव का स्मरण करेंगे, उनका पूरा कुल निस्संदेह स्वर्ग जाता है (5.2.20.28)।

प्रतिहारेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें पाठ से मेल नहीं खातीं?

प्रतिहारेश्वर महादेव की कथा अक्सर बदले रूप में सुनाई जाती है। ये वे बातें हैं जो स्कन्दपुराण से मेल नहीं खातीं।

प्रचलित बात स्कन्दपुराण में क्या है स्थिति
यह लिंग शिव का रक्षक रूप है प्रतिहार नंदी हैं; लिंग द्वारपाल के पूजे हुए ईश्वर हैं पाठ से उलट
यह महाकाल के चार द्वारपालों में से एक है महाकालवन के चार द्वार-लिंग पिंगलेश्वर, कायावरोहणेश्वर, बिल्वकेश्वर और दर्दुरेश्वर हैं; प्रतिहारेश्वर इनमें नहीं हैं पाठ से उलट
नंदी ने कठोर तप के बाद शिप्रा किनारे लिंग स्थापित किया उन्होंने विधि अनुसार कापालिक के वेश में देव की पूजा की; स्थापना और शिप्रा का उल्लेख नहीं है पाठ से उलट
अग्नि ने इंद्र के कहने पर हंस का रूप लिया योजना अग्नि की अपनी है पाठ से उलट
नंदी को कर्तव्य में चूक के कारण शाप मिला कारण नहीं दिया गया; नंदी सजग हैं और छले जाते हैं पाठ में नहीं
देवताओं ने उन्हें महाकालवन जाने की सलाह दी सलाह लोकपालों ने दी पाठ से उलट
वाणी ने पद लौटाया और लिंग का नाम रखा वाणी शाप से मुक्ति की बात कहती है; नाम शिव के अपने कथन में आता है; पद पर वापसी टैगरे की टिप्पणी में है आंशिक रूप से पाठ में
यह लिंग स्वयंभू है यह शब्द पाठ में नहीं है पुष्टि नहीं
इससे शत्रु और तंत्र-मंत्र का भय मिटता है, पदोन्नति और संतान मिलती है पाठ में धन, मनचाहा फल, पद से वियोग न होना, सात जन्मों के पापों का नाश और परिवार को स्वर्ग का उल्लेख है पाठ में नहीं
सावन, सोमवार, प्रदोष और चतुर्दशी विशेष हैं अध्याय कोई दिन नहीं बताता; चतुर्दशी का फल अध्याय 21, कुक्कुटेश्वर का है पाठ में नहीं
मंदिर का संबंध गुर्जर-प्रतिहार वंश से है किसी स्रोत में दोनों का संबंध नहीं मिलता; नाम प्रतिहार यानी द्वारपाल से बना है प्रमाण नहीं
द्वारपाल नंदी हैं, शिव नहीं

कुछ पन्ने इस लिंग को शिव का रक्षक रूप कहते हैं। अध्याय कुछ और कहता है: प्रतिहार नंदी हैं, और लिंग का नाम उन देव पर है जिन्हें नंदी ने पूजा। यह महाकालवन के चार द्वार-लिंगों से भी अलग बात है, जो पवित्र क्षेत्र के ही रक्षक हैं।

ऑनलाइन घूमता आरंभिक श्लोक असली नहीं है

ऑनलाइन घूमता एक श्लोक "विंशतिं विद्धि देवेश" से शुरू होता है और सब विघ्न मिटने की बात करता है। संस्कृत पृष्ठ का श्लोक अलग है: उसमें "विंशतिमं" यानी बीसवें का क्रमवाचक है, और फल विघ्न-नाश नहीं, धन बताया गया है। ऑनलाइन वाला रूप मिले तो उसे उद्धृत न करें।

बाद का अध्याय इस लिंग को पहचान-चिह्न बनाता है

अध्याय 23 में, मेघनादेश्वर के प्रसंग में, विष्णु देवताओं से कहते हैं कि वह लिंग प्रतिहारेश्वर के उत्तर-पूर्व में स्थित है। चतुरशीति लिंग माहात्म्य में इस लिंग से जुड़ी यही एकमात्र दिशा है, क्योंकि अध्याय 20 में कोई दिशा नहीं दी गई।

दोहराई गई कथा

अध्याय की पृष्ठभूमि, यानी मंदर पर शिव-पार्वती का लंबा विहार, चिंतित देवता और बाधा डालने भेजे गए अग्नि, कार्तिकेय के जन्म की ज्यादा जानी-पहचानी कथा से मिलती है, जिसे यहाँ नंदी के शाप की ओर मोड़ा गया है। टैगरे अपनी भूमिका में लिखते हैं कि लेखक कभी-कभी किसी पुरानी पौराणिक कथा को अपने प्रयोजन के अनुसार बदल देता है।

प्रतिहारेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?

नंदी को शाप क्यों मिला?

पाठ कोई कारण नहीं देता। नंदी देहली पर सजग खड़े हैं, अग्नि हंस के रूप में उन्हें छल जाते हैं, और शिव उन्हें भूलोक जाने का शाप देते हैं। नंदी स्वयं पूछते हैं कि क्या उनसे पहले कोई बुरा कर्म हुआ था। इसे लापरवाही कहना, जैसा कुछ पन्ने करते हैं, एक व्याख्या है, श्लोकों में लिखी बात नहीं।

कापालिक क्या है, और नंदी ने यह वेश क्यों लिया?

टैगरे अनुवाद केवल इतना कहता है कि नंदी ने कापालिक का वेश धारण किया और विधि के अनुसार देव की पूजा की। उसमें न यह है कि उन्होंने यही रूप क्यों चुना, न पूजा का ब्योरा। उस एक पंक्ति के आगे अध्याय में कापालिक साधना जैसा कुछ भी नहीं मिलता।

क्या प्रतिहारेश्वर मंदिर का संबंध गुर्जर-प्रतिहार राजाओं से है?

किसी स्रोत में दोनों का संबंध नहीं मिलता। नाम प्रतिहार से बना है, जिसका अर्थ द्वारपाल है, और कथा में द्वारपाल नंदी हैं। गुर्जर-प्रतिहार वंश से इसका बस शब्द का मेल है। केवल नाम देखकर इस लिंग को किसी राजकीय या ऐतिहासिक उत्पत्ति से न जोड़ें।

क्या आज का मंदिर वही स्थान है जिसका पुराण वर्णन करता है?

अध्याय 20 महाकालवन के अलावा कोई दिशा या पहचान-चिह्न नहीं देता। आज के प्रतिहारेश्वर की पहचान परंपरा से है, पटनी बाजार के पास नागचंद्रेश्वर मंदिर के परिसर में। पाठ का इकलौता सुराग मेघनादेश्वर का उत्तर-पूर्व वाला बाद का उल्लेख है, और उसे आज के स्थलों से किसी स्रोत ने नहीं मिलाया, इसलिए यह जुड़ाव आस्था पर टिका है।

84 महादेवों के क्रम में प्रतिहारेश्वर बीसवें क्यों हैं?

चतुरशीति लिंग माहात्म्य का अध्याय 19 नागचंद्रेश्वर (पाठ में नागचण्डेश्वर) है और अध्याय 20 प्रतिहारेश्वर। अगला, अध्याय 21, कुक्कुटेश्वर है। तीर्थ-नाम सूची (5.1.70) में भी प्रतिहारेश्वर आते हैं, हालाँकि वह सूची 84 का कड़ा क्रम नहीं है।

पूरे क्रम के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की पूरी गाइड देखें।

84 महादेवों में प्रतिहारेश्वर के बाद कौन-सा लिंग आता है?

अगला अध्याय 21 कुक्कुटेश्वर का है। उससे ठीक पहले, 19वें, नागचंद्रेश्वर हैं।