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उज्जैन: काल की नगरी

प्राचीन भारत का ग्रीनविच, जहां समय की उत्पत्ति हुई और भगवान महाकाल (समय के देवता) का वास है।

भौगोलिक विशिष्टता और भारत का ग्रीनविच

उज्जैन की भौगोलिक स्थिति अत्यंत विशिष्ट है। भारतीय खगोल-विज्ञान उज्जैन को केंद्रीय संदर्भ बिंदु (Central Reference Point) मानता है। वराहमिहिर से लेकर भास्कराचार्य जैसे महान लेखकों और खगोलविदों ने मानक समय सहित कई गणनाओं का श्रेय इसे दिया है।

उज्जैन हमेशा से समय और पंचांग (कैलेंडर) विज्ञान की गणना के लिए एक आदर्श स्थान रहा है, और इसलिए इसे 'भारत का ग्रीनविच' (Greenwich of India) भी कहा जाता है। यह प्राचीन 'ग्रीनविच' शहर 23.9 डिग्री उत्तरी अक्षांश (Northern Latitude) और 74.75 डिग्री पूर्वी देशांतर (Eastern Longitude) पर 1658 फीट की ऊंचाई पर स्थित है।

यह कर्क रेखा (Tropic of Cancer) पर स्थित है, जिसके कारण यह समय की गणना का एक बड़ा केंद्र है। खगोलीय गणनाओं के अनुसार, प्राचीन विद्वानों ने उज्जैन को शून्य डिग्री देशांतर (Zero Degree Longitude) पर माना था। यहीं पर कर्क रेखा और याम्योत्तर रेखा (Meridian) आपस में एक-दूसरे को काटती हैं।

सूर्य सिद्धांत का श्लोक:

"राक्षसालयदेवोकः शैलयोर्मध्यसूत्रगा।
रोहीतकं अवन्ती च यथा सन्निहितं सरः॥"

रोहतक, अवंती (उज्जैन) और कुरुक्षेत्र इस रेखा पर आते हैं। तदनुसार, याम्योत्तर रेखा लंका, सुमेरु, उज्जयिनी और अन्य शहरों से होकर गुजरती है।

महाकालेश्वर: काल (समय) के देवता

चूंकि संस्कृत में 'समय' को 'काल' कहा जाता है, इसलिए महाकाल की स्थिति और खगोल-विज्ञान में उज्जयिनी की केंद्रीयता के बीच गहरा संबंध है। यही कारण है कि भगवान महाकाल को समय का देवता माना जाता है।

किवदंतियों के अनुसार, भगवान महाकालेश्वर की मूर्ति पृथ्वी के ठीक उस प्रतिच्छेदन बिंदु (Intersection Point) पर स्थित है जहाँ कर्क रेखा और याम्योत्तर रेखा मिलती हैं, जिसे पृथ्वी का केंद्र माना जाता है। समय की गणना में शहर के महत्व के कारण, ऐसा प्रतीत होता है कि समय और ईश्वर महाकालेश्वर के रूप में एक हो गए हैं।

"कालचक्र प्रवर्तको महाकालः प्रतायनः"

भगवान महाकालेश्वर को काल गणना का संस्थापक माना गया है। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है: "अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्वतोमुखः" (मैं ही अक्षय काल हूँ)।

नाभिप्रदेश (मणिपुर चक्र) और महान खगोलविद

अपनी अनूठी भौगोलिक स्थिति के कारण उज्जैन को नाभिप्रदेश या मणिपुर चक्र भी कहा गया है। वराह पुराण में, उज्जैन शहर को शरीर का नाभिदेश बताया गया है और भगवान महाकालेश्वर को इसका इष्टदेव। भगवान महाकाल की नगरी संसार का केंद्र (Nucleus) है।

"आज्ञाचक्रं स्मृता काशी या बाला श्रुतिमूर्धनि
स्वाधिष्ठानं स्मृता कांची मणिपूरं अवन्तिका"

महान खगोलविद: वराहमिहिर और भास्कराचार्य

यहाँ खगोलविदों और ज्योतिषियों की एक प्रभावशाली परंपरा रही है। विद्वान वराहमिहिर का जन्म उज्जैन जिले के कायथा गाँव में शक संवत 427 में हुआ था। वह एकमात्र ऐसे विद्वान थे जिन्होंने ज्योतिष के सभी पहलुओं पर कई किताबें लिखीं - पंच-सिद्धांतिका, वृहत संहिता, वृहत जातक, वृहत विवाह पटल, यात्रा और लघु जातकम् उनकी कुछ प्रमुख पुस्तकें हैं।

प्राचीन गणितज्ञ भास्कराचार्य के अनुसार:

"यल्लकोज्जयिनी पुरपरि कुरुक्षेत्रादि देशान्स्पृशत्
सूत्रं सुमेरुगतं बुधैर्निगदता समध्यरेखा भवः"

जंतर मंतर, सूर्य और ब्रह्मांड के रहस्य

उज्जैन की अनूठी स्थिति को पहचानते हुए, राजा जयसिंह ने समय की गणना के लिए यहाँ एक वेधशाला (जंतर मंतर) की स्थापना की थी। भारतीय परंपरा के अनुसार, 21 मार्च से (जब दिन लंबे होने लगते हैं) सूर्य ठीक उज्जैन के ऊपर स्थित होता है। उज्जैन को सूर्य के ठीक नीचे स्थित होने का सौभाग्य प्राप्त है।

प्राचीन विद्वानों का कहना है कि मंगल ग्रह की उत्पत्ति यहीं से हुई थी - अर्थात् पृथ्वी का एक बड़ा द्रव्यमान यहाँ से अलग होकर एक नए ग्रह, मंगल का आकार ले लिया। यहाँ का ऐतिहासिक नवग्रह मंदिर और वेधशाला इसकी अनूठी भौगोलिक स्थिति की ओर इशारा करते हैं।

सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग - सभी युगों में उज्जैन की महिमा में ग्रंथ लिखे गए हैं। इस शहर के हृदय से समय की गणना का जो गहन अध्ययन संभव है, वह दुनिया के किसी अन्य हिस्से से संभव नहीं है, क्योंकि लिंगपुराण के अनुसार जीवन की उत्पत्ति यहीं से हुई थी। इस शहर में व्यापक शोध और प्रयोग ब्रह्मांड के कई अछूते पहलुओं को उजागर कर सकते हैं। ब्रह्मांड की शुरुआत और अंत से जुड़े कई सवालों के जवाब भी यहीं मिल सकते हैं।