अप्सरेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?

अप्सरेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में सत्रहवाँ शिवलिंग है, जिसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के 17वें अध्याय में मिलती है। इन्द्र से शापित अप्सरा रम्भा महाकालवन के लिंग का पूजन करती है। शिव उसे सौभाग्य, स्वर्ग और इन्द्र की प्रिया बनने का वर देते हैं, और अप्सराओं के पूजन से लिंग का नाम पड़ा।

नाम में अप्सरा और ईश्वर जुड़े हैं। कुछ सूचियों में "अपरेश्वर" या "Appareshwar" भी छपा है, जो बिगड़ा रूप है; यह लेख अप्सरेश्वर ही लिखता है।

स्थानीय परंपरा इस मंदिर को पटनी बाजार क्षेत्र में, मोदी की गली में बताती है, जिसे एक अखबारी सूची सुगंधी गली भी कहती है।

संक्षेप में जानें

  • कथा की केंद्रीय पात्र अप्सरा रम्भा है, मेनका, तिलोत्तमा या उर्वशी नहीं।
  • इन्द्र उसे शाप देते हैं, और नारद उसे महाकालवन के एक लिंग की ओर भेजते हैं।
  • शिव उसे सौभाग्य, स्वर्ग और इन्द्र की प्रिया बनने का वर देते हैं।
  • अप्सराओं के पूजन से लिंग का नाम अप्सरेश्वर पड़ा।

अप्सरेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?

विषय जानकारी
नाम का अर्थ अप्सराओं के ईश्वर (शिव)
देवता शिव, लिंग रूप में
मूल ग्रंथ स्कन्दपुराण, आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 17 (5.2.17)
84 महादेव में क्रम सत्रहवाँ
वक्ता और श्रोता शिव और पार्वती
केंद्रीय पात्र अप्सरा रम्भा

स्कन्दपुराण में अप्सरेश्वर महादेव की कथा क्या है?

पिछला अध्याय, ईशानेश्वर वाला, इस कथन पर खत्म होता है कि अब अप्सरेश्वर की शक्ति सुनो। आगे की कथा आम तौर पर इस तरह सुनाई जाती है।

रम्भा को शाप

इन्द्र सभा में बैठे हैं और अप्सरा रम्भा उनके सामने नृत्य करती है। उसका मन भटकता है और लय-ताल चूक जाती है। इन्द्र शाप देते हैं कि वह कान्तिहीन होकर मृत्युलोक जाए। रम्भा पृथ्वी पर गिरकर विलाप करती है, और उसकी सखी अप्सराएँ भी पहुँचती हैं।

नारद का उपाय

ऋषि नारद आते हैं, ध्यान करते हैं और उपाय बताते हैं: महाकालवन जाओ, वहाँ मनोरथ पूरा करने वाला एक लिंग है, उसका पूजन करो।

शिव का वर

रम्भा सहित अप्सराएँ लिंग का पूजन करती हैं और शिव प्रसन्न होते हैं। रम्भा को दिया गया वर इस अध्याय का वह श्लोक है जो मूल संस्कृत में देखा जा सका:

रंभे प्राप्स्यसि सौभाग्यं स्वर्गलोकं यशस्विनि ।
भविष्यसि महाभागे जिष्णोस्त्वं वल्लभा ध्रुवम् ॥

अर्थ: हे यशस्विनी रम्भा, तुम सौभाग्य और स्वर्गलोक पाओगी; हे महाभागे, तुम निश्चय ही जिष्णु (इन्द्र) की प्रिया बनोगी (स्कन्दपुराण 5.2.17.19)।

अप्सराओं के पूजन के कारण यह लिंग अप्सरेश्वर कहलाता है।

स्कन्दपुराण के अनुसार अप्सरेश्वर ने रम्भा को क्या दिया?

श्लोक 19 तीन बातें बताता है:

  1. सौभाग्य।
  2. स्वर्गलोक।
  3. इन्द्र की प्रिया के रूप में वापसी।

अप्सरेश्वर महादेव के बारे में कौन-सी प्रचलित बातें पाठ से मेल नहीं खातीं?

अप्सरेश्वर महादेव की कथा अक्सर बदलकर सुनाई जाती है। ये दावे स्कन्दपुराण से मिलाए नहीं जा सके।

प्रचलित बात पाठ से क्या कहा जा सकता है स्थिति
नारद ने कहा कि लिंग हरसिद्धि पीठ के सामने है अध्याय के पाठ में पुष्ट नहीं; आज का मंदिर भी हरसिद्धि के सामने नहीं है अपुष्ट
उर्वशी को इसी लिंग के पूजन से पुरूरवा पति मिले पुष्ट श्लोक रम्भा का नाम लेता है; उर्वशी प्रसंग के दो संस्करण आपस में भिन्न हैं अपुष्ट
लिंग खोया पद और प्रतिष्ठा लौटाता है, दूसरे को भेजने पर भी देखे गए श्लोकों में नहीं मिला संभवतः बाद की मान्यता
स्पर्श से राज्य-सुख और मोक्ष मिलता है देखे गए श्लोकों में नहीं मिला अपुष्ट
"देवं सप्तदशं विद्धि विख्यातं अप्सरेश्वरम्" अध्याय का पहला श्लोक है जहाँ तक जाँचा गया, यह मूल श्लोक 1 से नहीं मिलता, और छपे रूप में इसका संस्कृत भी अशुद्ध है अपुष्ट
यह लिंग संरक्षित स्मारक है संरक्षित दर्जे का कोई प्रमाण नहीं मिला अपुष्ट

यह कथा रम्भा और अप्सराओं की दूसरी कथाओं से कैसे अलग है?

अप्सरा के शाप की कथाएँ आम हैं, इसलिए कई कथाएँ इससे आसानी से गड्डमड्ड हो जाती हैं।

कथा ग्रंथ शाप देने वाला अप्सरेश्वर से संबंध
रम्भा का पत्थर बनना वाल्मीकि रामायण, बालकाण्ड 1.64 विश्वामित्र अलग कथा; दोनों को न जोड़ें
मेनका और विश्वामित्र महाभारत आदि शाप नहीं असंबद्ध; इससे शकुन्तला का जन्म होता है
उर्वशी और पुरूरवा ऋग्वेद, विक्रमोर्वशीय, पुराण ग्रंथ के अनुसार अलग अध्याय 17 में पुष्ट नहीं
अप्सराकुण्ड स्कन्दपुराण 5.1.8 जाँचा नहीं गया Tagare अध्याय 17 को इसी कथा का दोहराव गिनते हैं
Tagare इसे दोहराई गई कथा कहते हैं

चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य की भूमिका में G. V. Tagare लिखते हैं कि लेखक कभी किसी पुरानी पौराणिक कथा को अपने उद्देश्य के अनुसार बदल देता है, या नई कथा को पौराणिक नाम दे देता है। दोहराई गई कथाओं में वे "अप्सरःखण्ड (अध्याय 17)" को गिनते हैं। आवन्तीखण्ड के पहले भाग में अध्याय 8 "अप्सराकुण्ड की महिमा" है, इसलिए अप्सरेश्वर की कथा उसी पुरानी कथा का रूपांतर लगती है।

लोकप्रिय श्लोक की जाँच बाकी है

"देवं सप्तदशं विद्धि" से शुरू होने वाली एक पंक्ति ऑनलाइन खूब चलती है और उसे इस अध्याय का पहला श्लोक बताया जाता है। छपे रूप में उसका संस्कृत अशुद्ध है ("लोकोऽभीष्टान्" में अवग्रह गायब है), और उसे मूल से मिलाया नहीं गया है। जब तक मिलान न हो, केवल श्लोक 19 उद्धृत करें।

अप्सरेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?

कथा किस अप्सरा की है?

जो श्लोक जाँचा जा सका, वह सीधे रम्भा को संबोधित है ("रंभे")। प्रचलित कथाओं में कभी उर्वशी भी आ जाती है, पर अध्याय में उसकी पुष्टि नहीं है। मेनका और तिलोत्तमा इस कथा का हिस्सा नहीं हैं। जिस अप्सरा का शाप लिंग पर कटता है, वह रम्भा है।

रम्भा को किसने शाप दिया और किसने उपाय बताया?

प्रचलित कथा में नृत्य की लय चूकने पर इन्द्र रम्भा को शाप देते हैं, और ऋषि नारद उसे महाकालवन के लिंग का पूजन करने को कहते हैं। श्लोक 19 इन्द्र वाले पक्ष का समर्थन करता है, क्योंकि वर में वह जिष्णु, यानी इन्द्र की प्रिया बनती है। नारद वाला अंश सारांशों से है, पुष्ट नहीं।

क्या यह वही रम्भा है जो पत्थर बनी थी?

नहीं। रामायण में विश्वामित्र के शाप से पत्थर बनी रम्भा की अलग कथा है। अप्सरेश्वर वाले अध्याय में शाप इन्द्र देते हैं और शिव उसे स्वर्ग की आशा लौटाते हैं। दोनों कथाओं में कोई संबंध नहीं मिलता, इसलिए एक ही कथन में उन्हें न मिलाएँ।

क्या आज का मंदिर वही जगह है जिसका पुराण में वर्णन है?

पुराण लिंग को महाकालवन में रखता है, और दिशा या भू-चिह्न वाला पाठ पढ़ा नहीं जा सका। अप्सरेश्वर के आज के मंदिर की पहचान परंपरा से, पटनी बाजार क्षेत्र में होती है। किसी स्रोत ने पुराण के किसी भू-चिह्न को आज के स्थान से नहीं मिलाया, इसलिए पाठ और मंदिर का मिलान श्रद्धा का विषय है।

उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में अप्सरेश्वर सत्रहवें क्यों हैं?

अध्याय 16 (ईशानेश्वर) इस कथन पर खत्म होता है कि अब अप्सरेश्वर की शक्ति सुनी जाए, और अध्याय 17 अप्सरेश्वर का है। तीर्थ-नामों की सूची (5.1.70) में भी "अप्सरेश्वर नाम से प्रसिद्ध" लिंग का नाम आता है।

आगे अध्याय 18 कलकलेश्वर का है। पूरे क्रम के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।

अप्सरेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?

अगला अध्याय 18 कलकलेश्वर का है। ठीक पहले सोलहवें स्थान पर ईशानेश्वर हैं।