नागचंद्रेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?

नागचंद्रेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में उन्नीसवाँ शिवलिंग है, जिसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के 19वें अध्याय में मिलती है। देवताओं को महाकालवन में निर्माल्य लाँघने के पाप का डर है, और गण नागचण्ड उन्हें वह लिंग बताता है जो यह पाप मिटाता है। लिंग का नाम उसी के नाम पर पड़ा।

मंदिर पर और स्थानीय सूचियों में नाम नागचंद्रेश्वर लिखा है, और यह लेख वही लेता है। स्कन्दपुराण के पाठ में नाम नागचण्डेश्वर है, यानी गण नागचण्ड से। महाकाल परिसर के एक दूसरे मंदिर का नाम भी नागचंद्रेश्वर है, जिसका अंतर आगे दिया है।

स्थानीय परंपरा इस मंदिर को पटनी बाजार के पास नागनाथ की गली में बताती है, और बीसवें महादेव प्रतीहारेश्वर को उसी परिसर में।

संक्षेप में जानें

  • अध्याय निर्माल्य, यानी देवता पर चढ़कर उतारे गए अर्पण, को लाँघने के पाप पर है।
  • नागचण्ड नाम का गण महाकाल की भक्ति से गणपद पाता है।
  • वह देवताओं को ईशानेश्वर के ईशान कोण में स्थित लिंग बताता है।
  • पुराण के अनुसार लिंग का नाम उसी गण से पड़ा, साँप या चंद्रमा से नहीं।

नागचंद्रेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?

विषय जानकारी
नाम का अर्थ गण नागचण्ड के नाम पर पड़ा शिव का नाम
देवता शिव, लिंग रूप में
मूल ग्रंथ स्कन्दपुराण, आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 19 (5.2.19)
84 महादेव में क्रम उन्नीसवाँ
केंद्रीय विषय निर्माल्य लाँघने का पाप
अगला लिंग प्रतीहारेश्वर, बीसवाँ

स्कन्दपुराण में नागचंद्रेश्वर महादेव की कथा क्या है?

कथा शिव पार्वती को सुनाते हैं, और अध्याय की आरंभिक पंक्ति लिंग को उन्नीसवाँ बताती है। अध्याय पर Tagare की टिप्पणी उसका विषय बताती है: शिव का निर्माल्य (बासी फूल आदि) लाँघना बड़ा पाप है, और इस देवता की उपासना से वह टल जाता है।

इन्द्र का नारद से प्रश्न

सुधर्मा सभा में इन्द्र ऋषि नारद से पूछते हैं कि सब तीर्थों में श्रेष्ठ कौन-सा है। नारद कहते हैं कि प्रयाग श्रेष्ठ है, पर महाकाल क्षेत्र उससे दस गुना अधिक पवित्र है।

लौटते देवता

देवता अपने विमानों से आकाश से उतरकर महाकालवन को देखते हैं। वहाँ अंगुल भर भी खाली जगह नहीं है। Tagare के अनुवाद में वह "साठ हज़ार करोड़ और छह हज़ार करोड़ लिंगों" से भरा है। उन्हें डर है कि वहाँ चलना निर्माल्य लाँघना होगा, इसलिए वे लौट जाते हैं।

गण नागचण्ड

स्वर्ग की ओर लौटते हुए उन्हें एक तेजस्वी गण दिखता है। वह बताता है कि महाकाल की भक्ति से उसे गणपद मिला है, और उसे "नागचण्ड" नाम का एक सुंदर नाम भी दिया गया।

देवता पूछते हैं कि क्या उसने कभी निर्माल्य लाँघा। वह उपाय बताता है: ईशानेश्वर लिंग के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) में स्थित एक लिंग।

देवता लिंग को नाम देते हैं

देवता लौटकर महाकाल का पूजन करते हैं, लिंग के दर्शन करते हैं और पापमुक्त होते हैं। Tagare के अनुवाद में उनका नामकरण-वाक्य यह है:

"This has been spoken to us by the intelligent Nāgacaṇḍa. Hence this deity shall have the name of Nāgacaṇḍeśvara in this world."

अध्याय "अब प्रतीहारेश्वर के बारे में सुनो" पंक्ति पर खत्म होता है, जो बीसवें अध्याय का आरंभ है।

स्कन्दपुराण नागचंद्रेश्वर महादेव के पूजन का क्या फल बताता है?

अध्याय ये फल गिनाता है:

  1. लिंग के पूजन से निर्माल्य लाँघने का पाप नष्ट होता है।
  2. नित्य दर्शन से जाने या अनजाने किए सब पाप नष्ट होते हैं।
  3. पूजन करने वाला सात जन्मों तक सुख, आनंद, आरोग्य, रोगमुक्ति और सुंदर रूप पाता है।
  4. देवता की स्तुति गाने से वह इच्छित फल मिलता है जो देवताओं को भी दुर्लभ है।

नागचंद्रेश्वर महादेव के बारे में कौन-सी प्रचलित बातें पाठ से मेल नहीं खातीं?

नागचंद्रेश्वर महादेव की कथा अक्सर दूसरी कथाओं में मिला दी जाती है। ये वे बातें हैं जो स्कन्दपुराण से मेल नहीं खातीं।

प्रचलित बात स्कन्दपुराण में क्या है स्थिति
19वें महादेव महाकाल मंदिर की तीसरी मंज़िल पर हैं 19वाँ लिंग पटनी बाजार के पास बताया जाता है; तीसरी मंज़िल वाला मंदिर अलग है गलत
नाम नाग (साँप) या चंद्र (चंद्रमा) से बना है पुराण का नाम नागचण्डेश्वर गण नागचण्ड से बना है, और कथा में न साँप है न चंद्रमा पाठ के विपरीत
गण का अपना नाम नागचंद्रेश्वर था गण का नाम नागचण्ड है; नागचण्डेश्वर वह नाम है जो देवताओं ने लिंग को दिया पाठ के विपरीत
दर्शन से कालसर्प दोष मिटता है, और नागपंचमी विशेष है अध्याय में नहीं है; ये महाकाल परिसर के मंदिर की मान्यताएँ हैं पाठ में नहीं
फल यश और कीर्ति है फल निर्माल्य के पाप का अंत, पापमुक्ति और सात जन्मों का सुख और आरोग्य हैं पाठ में नहीं
84 महादेव दूषण राक्षस के रक्त-बिंदुओं से प्रकट हुए अध्याय 19 में ऐसा कुछ नहीं है; इस लिंग की उत्पत्ति निर्माल्य की कथा है पाठ में नहीं
बीसवें महादेव "प्रतिज्ञारेश्वर" हैं पाठ का नाम प्रतीहारेश्वर है, प्रतीहार यानी द्वारपाल से छपाई की भूल
दो नागचंद्रेश्वर, दो अलग मंदिर

श्री महाकालेश्वरउज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन। मंदिर की तीसरी मंज़िल का नागचंद्रेश्वर मंदिर साल में केवल नागपंचमी को खुलता है और दशमुखी सर्प-शय्या पर शिव-परिवार की प्रतिमा के लिए जाना जाता है। उन्नीसवें महादेव पटनी बाजार में हैं। महाकाल मंदिर के भोज और सिंधिया वाले इतिहास, नेपाल की बात और नागराज तक्षक की मान्यता उसी मंदिर की हैं, इस अध्याय की नहीं।

यह साँप की कथा नहीं है

अध्याय 19 में "नाग" केवल गण के नाम का हिस्सा है। कथा में कोई सर्प नहीं आता। इस शृंखला की असली सर्प-कथा कर्कोटेश्वर, यानी दसवें महादेव, की है। उसे उन्नीसवें पर न ले जाएँ।

निर्माल्य का अर्थ

निर्माल्य वह है जो देवता को चढ़ाने के बाद उतार लिया जाता है: फूल, पत्र आदि। उसे पवित्र माना जाता है और पैरों तले नहीं रौंदा जाता। इसीलिए इस अध्याय में लिंगों से भरी भूमि एक समस्या है: हर कदम पर चढ़ावे को लाँघने का खतरा रहता है।

पंचक्रोशी यात्रा में नागचंद्रेश्वर मंदिर की क्या भूमिका है?

उज्जैन की लगभग 118 किमी की वार्षिक पंचक्रोशी यात्रा की समाचार-रिपोर्टों के अनुसार यात्री यात्रा इसी मंदिर से शुरू करते हैं और देवता से "बल" लेते हैं। यात्रा पूरी करके वे उसी मंदिर में लौटकर नारियल अर्पित करते हुए वह बल वापस करते हैं।

स्कन्दपुराण का अध्याय पंचक्रोशी के बारे में कुछ नहीं कहता, इसलिए यह जीवित लोक-परंपरा है, पौराणिक नहीं।

नागचंद्रेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?

देवताओं को निर्माल्य लाँघने का डर क्यों था?

अध्याय में महाकालवन लिंगों से इतना भरा है कि अंगुल भर भी खाली जगह नहीं है। देवताओं को डर है कि वहाँ चलना उन पर चढ़े निर्माल्य को लाँघना होगा, जिसे पाठ बड़ा पाप कहता है। वे लौट जाते हैं, जब तक गण नागचण्ड उन्हें दोष मिटाने का उपाय नहीं बताता।

नागचण्ड कौन है?

नागचण्ड एक तेजस्वी गण है, जो देवताओं को स्वर्ग लौटते हुए मिलता है। वह कहता है कि महाकाल की भक्ति से उसे गणपद मिला, और नागचण्ड उसे दिया गया एक सुंदर नाम है। जिस लिंग की ओर वह इशारा करता है, उसका नाम आगे उसी के नाम पर नागचंद्रेश्वर पड़ता है।

क्या पाठ का "ईशानेश्वर के उत्तर-पूर्व" आज की गली से मेल खाता है?

पुराण लिंग को ईशानेश्वर के उत्तर-पूर्व में रखता है। आज दोनों मंदिर पटनी बाजार के आसपास हैं: ईशानेश्वर मोदी की गली में और नागचंद्रेश्वर नागनाथ की गली में। किसी सर्वे या नक्शे से उनकी आपसी दिशा सिद्ध नहीं होती, इसलिए पाठ और मंदिर का मिलान परंपरा पर टिका है।

क्या यह मंदिर वही है जो महाकाल मंदिर के ऊपर है?

नहीं। 84 महादेव वाला नागचंद्रेश्वर पटनी बाजार के पास का अलग मंदिर है, जिसकी अपनी पौराणिक कथा निर्माल्य की है। महाकाल परिसर की तीसरी मंज़िल का नागचंद्रेश्वर दूसरा मंदिर है, जो सर्प-परंपराओं से जुड़ा है और साल में एक बार खुलता है। नाम एक-सा है, पर मंदिर और कथाएँ साझा नहीं हैं।

उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में नागचंद्रेश्वर उन्नीसवें क्यों हैं?

चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य का 19वाँ अध्याय नागचंद्रेश्वर के नाम का अध्याय है। उससे पहले अध्याय 18 कलकलेश्वर का है, और बाद में अध्याय 20 प्रतीहारेश्वर का। तीर्थ-नामों की सूची (5.1.70) में भी पुराण की वर्तनी (मूर्धन्य ण्ड) मिलती है, जिसमें कल्कलेश्वर के बाद प्रभु नागचण्डेश्वर आते हैं।

पूरे क्रम के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।

नागचंद्रेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?

अगला अध्याय 20 प्रतीहारेश्वर का है, जिसका नाम प्रतीहार, यानी द्वारपाल, से बना है। ठीक पहले अठारहवें स्थान पर कलकलेश्वर हैं।