कलकलेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?
कलकलेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में अठारहवाँ शिवलिंग है, जिसका वृत्तांत स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के 18वें अध्याय में है। कथा शिव के पार्वती को "काली" कहने से खुलती है, और उसी पुराण का एक पुराना अध्याय शिव और गौरी के कलह से एक देवता का प्रकट होना बताता है, जो कलकलेश्वर कहलाए।
Tagare के अनुवाद में नाम कलकलेश्वर लिखा है, और यह लेख वही लेता है। कभी "कल्कलेश्वर" भी छपा मिलता है, जो उसी नाम का पाठान्तर है।
स्थानीय परंपरा इस मंदिर को उज्जैन के पटनी बाजार क्षेत्र की मोदी की गली में, गोपाल मंदिर के पास बताती है।
संक्षेप में जानें
- अध्याय के श्लोक 7 में शिव पार्वती को "काली" कहकर अपने पास बैठने को कहते हैं।
- पुराना अध्याय कहता है कि शिव और गौरी के कलह से एक देवता प्रकट हुए, जो कलकलेश्वर कहलाए।
- कलकल का अर्थ कोलाहल या शोर है, और यह शिव का एक नाम भी है।
- नाम "कलह" (झगड़ा) से नहीं बना, और "काल" (समय) से भी नहीं।
कलकलेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| नाम का अर्थ | कलकल (कोलाहल) नाम के ईश्वर (शिव) |
| देवता | शिव, लिंग रूप में |
| मूल ग्रंथ | स्कन्दपुराण, आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 18 (5.2.18) |
| 84 महादेव में क्रम | अठारहवाँ |
| समानांतर वृत्तांत | स्कन्दपुराण 5.1.8, अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्य, अध्याय 8 |
स्कन्दपुराण में कलकलेश्वर महादेव की कथा क्या है?
अप्सरेश्वर वाला अध्याय इस कथन पर खत्म होता है कि अगले लिंग की शक्ति सुनी जाए, और आगे अध्याय 18 आता है। उसका एक श्लोक, श्लोक 7, संस्कृत पाठ में पढ़ा जा सका:
कालि सुंदरि मत्पार्श्वे वल्लभे त्वमुपाविश ।
शरीरे मम तन्वंगि सिते भास्यसितद्युतिः ॥
अर्थ: हे काली, हे सुन्दरी, हे प्रिये, तुम मेरे पास बैठो; हे तन्वंगी, मेरे श्वेत शरीर पर तुम श्याम कान्ति वाली होकर शोभित होती हो (स्कन्दपुराण 5.2.18.7)।
यहाँ शिव स्वयं "मेरे पास" कहते हैं, यानी वे कथा अपनी ही घटना के रूप में सुना रहे हैं। "काली" शब्द का केंद्र वही श्याम रंग है, और पुराने वृत्तांत में यही देवी को क्रोधित करता है।
पहले भाग के अध्याय 8 का पुराना वृत्तांत
अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्य के अध्याय 8 में, जिसे सनत्कुमार व्यास को सुनाते हैं, यही प्रसंग विस्तार से है। Tagare उसका अनुवाद यों करते हैं:
"Formerly the Goddess was rebuked by Śaṅkara calling her 'Kālī' ('Dark-coloured') and 'Pārvatī' ('Mountain-girl'). Then the Goddess became angry with Śaṅkara in the Kaṭaka (tableland). When the quarrel between Śiva and Gaurī broke out a deity originated there itself. It is called Kalakaleśvara."
उसी अंश में आगे है कि सामने कलहनाशन नाम का एक पवित्र कुण्ड बनाया गया, और वहाँ स्नान करने से प्रिय का झगड़ना बंद हो जाता है। उस तीर्थ में स्नान, महेश्वर का पूजन और एक रात का उपवास करने वाला अपने कुल के सौ लोगों का उद्धार करता है।
स्कन्दपुराण कलकलेश्वर महादेव के पूजन का क्या फल बताता है?
अध्याय 18 के अपने फल पढ़े नहीं जा सके। समानांतर वृत्तांत (अध्याय 8) ये फल बताता है:
- कलहनाशन कुण्ड में स्नान से प्रिय का झगड़ना बंद हो जाता है।
- उस तीर्थ में स्नान, महेश्वर का पूजन और एक रात का उपवास कुल के सौ लोगों का उद्धार करता है।
कलकलेश्वर महादेव के बारे में कौन-सी प्रचलित बातें पाठ से मेल नहीं खातीं?
कलकलेश्वर महादेव की कथा अक्सर बदलकर सुनाई जाती है। ये दावे स्कन्दपुराण से मिलाए नहीं जा सके।
| प्रचलित बात | पाठ से क्या कहा जा सकता है | स्थिति |
|---|---|---|
| नाम का अर्थ "कलह हरने वाला" है | कलकल का अर्थ कोलाहल है; कलह से कोलाहल उपजा, पर शब्द कलह से नहीं बना | गलत व्युत्पत्ति |
| नाम "काल" (समय) से जुड़ा है, या "समय की उथल-पुथल को शांत करने वाला" | काल (समय) और कलकल (शोर) अलग शब्द हैं, और कोश इन्हें नहीं जोड़ते | गलत |
| नाम "कालकाल" (काल का भी काल) के समान है | कालकाल दीर्घ स्वरों वाला अलग शब्द है, जो दूसरे पुराणों में शिव के लिए आता है; कोश कलकल को शोर बताते हैं | गलत |
| अध्याय का पहला श्लोक "देवमष्टादशं विद्धि... कल्हौनैव जायते" है | छपी दूसरी पंक्ति मान्य संस्कृत नहीं है; संभावित पाठ "कलहो नैव जायते" है, पर वह अनुमान है, मूल से मिलाया हुआ नहीं | अपुष्ट |
| लिंग के दर्शन से पति-पत्नी का कलह मिटता है | समानांतर वृत्तांत में यह कलहनाशन कुण्ड के स्नान से जुड़ा है; अध्याय 18 का फल पढ़ा नहीं गया | पाठ में आंशिक |
| लिंग पृथ्वी फाड़कर प्रकट हुआ, आकाशवाणी हुई और देवताओं ने पूजा की | पुराना वृत्तांत केवल कहता है कि कलह फूटने पर वहीं एक देवता प्रकट हुए | अपुष्ट |
| रोग, सर्प और अग्नि के भय से मुक्ति; श्रावण और चतुर्दशी विशेष | पढ़े गए अंशों में नहीं मिला | अपुष्ट |
| पुष्य नक्षत्र से संबंध और चाँदी का दान | 84 महादेवों को नक्षत्रों से जोड़ने वाली एक ज्योतिषी की परंपरा है; पुराण ऐसा नहीं कहता | बाद की परंपरा |
क्या यह दूसरे ग्रंथों के कलकलेश्वर जैसा ही है?
कलकलेश्वर नाम एक से ज़्यादा तीर्थों पर आता है, और उन्हें आपस में नहीं मिलाना चाहिए।
| ग्रंथ | नाम | उज्जैन के 18वें लिंग से संबंध |
|---|---|---|
| स्कन्दपुराण 5.2.18 | कलकलेश्वर | यही अध्याय |
| स्कन्दपुराण 5.1.8 (अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्य) | कलकलेश्वर, कलहनाशन कुण्ड सहित | महाकालवन के उसी प्रसंग का समानांतर वृत्तांत |
| स्कन्दपुराण 5.3.154 (रेवा खण्ड) | नर्मदा तट का कलकलेश्वर तीर्थ | अलग तीर्थ |
| स्कन्दपुराण 7.1.75 (प्रभास खण्ड) | प्रभास का कलकलेश्वर या कलकलेश | अलग तीर्थ |
| शिवपुराण और सौरपुराण | कालकाल | अलग शब्द; शिव द्वारा काल (मृत्यु) का दहन |
इन्द्रद्युम्नेश्वर वाले अध्याय में मार्कण्डेय राजा को "कल्कलेश्वर देव के समीप, बाईं ओर" स्थित पापहर लिंग के पास भेजते हैं (5.2.15.18)। यानी कलकलेश्वर का अपना अध्याय आने से पहले ही वह पाठ में एक जाना हुआ स्थान है। वहाँ नाम "कल्कलेश्वर" छपा है और अध्याय-सूची में "कलकलेश्वर", जो संभवतः पाठान्तर है।
चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य की भूमिका में G. V. Tagare लिखते हैं कि लेखक कभी किसी पुरानी पौराणिक कथा को अपने उद्देश्य के अनुसार बदल देता है। उनके उदाहरणों में कलकलेश्वर का नाम नहीं है, पर पहले भाग के अध्याय 8 का वृत्तांत यही प्रसंग है, इसलिए यह अध्याय उसी श्रेणी में आता दिखता है।
कलकलेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?
कलकल का क्या अर्थ है?
Apte के कोश में कलकल का अर्थ भीड़ की गुनगुनाहट या अस्पष्ट, उलझा हुआ शोर है, और साथ में शिव का एक नाम और राल भी। यह कलह, यानी झगड़ा, नहीं है। शिव और गौरी के झगड़े से शोर उठा, इसलिए कथा और शब्द मेल खाते हैं, पर व्युत्पत्ति कलह से नहीं है।
शिव के "काली" कहने से कलह क्यों हुआ?
पुराने वृत्तांत में शंकर ने देवी को "काली", यानी श्याम रंग वाली, और "पार्वती", यानी पर्वत की पुत्री, कहकर फटकारा और वे क्रोधित हो गईं। अध्याय 18 का श्लोक 7 शिव को उन्हें "काली" कहते और उनकी श्याम कान्ति का उल्लेख करते दिखाता है। पढ़ी गई पंक्तियों में इससे आगे कुछ नहीं है।
क्या यह प्रभास या नर्मदा वाला कलकलेश्वर है?
नहीं। स्कन्दपुराण में नर्मदा के रेवा खण्ड और प्रभास खण्ड में भी इसी नाम के तीर्थ हैं। वे अलग स्थान हैं और उनके अपने वृत्तांत हैं। उज्जैन का अठारहवाँ महादेव आवन्त्यखण्ड के चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य का है, और उन दोनों से उसका कोई संबंध नहीं मिलता।
क्या आज का मंदिर वही जगह है जिसका पुराण में वर्णन है?
अध्याय 15 कलकलेश्वर के समीप बाईं ओर एक लिंग बताता है, और अध्याय 15, 16 और 18 पाठ में एक-दूसरे के पास हैं। मोदी की गली की आज की गलियाँ इस निकटता से मेल खाती हैं। "बाईं ओर" को किसी आज की इमारत से जोड़ने वाला स्रोत नहीं है, इसलिए पाठ और मंदिर का मिलान परंपरा पर टिका है।
उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में कलकलेश्वर अठारहवें क्यों हैं?
चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य का 18वाँ अध्याय कलकलेश्वर के नाम का अध्याय है। उसके आसपास पहले अप्सरेश्वर (17) और बाद में नागचण्डेश्वर (19) हैं।
तीर्थ-नामों का क्रम इस हिस्से में इसी तरह चलता है। पूरे क्रम के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।
कलकलेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?
अगला अध्याय 19 नागचण्डेश्वर का है। पुराण में उसके नाम में मूर्धन्य ण्ड है, इसलिए वह महाकाल मंदिर के नागचन्द्रेश्वर से अलग नाम है। ठीक पहले सत्रहवें स्थान पर अप्सरेश्वर हैं।
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