कुटुम्बेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?
कुटुम्बेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में चौदहवाँ शिवलिंग है, जिसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के 14वें अध्याय में मिलती है। शिप्रा ने कालकूट विष को कामेश्वर के सामने स्थित एक परम लिंग पर रखा। ऋषि लकुलीश के उस पर आरूढ़ होने के बाद लिंग स्पर्श के योग्य हुआ और कुटुम्बेश्वर कहलाया।
नाम में दो शब्द हैं: कुटुम्ब (परिवार) और ईश्वर। अखबारी सूचियों में कभी "कुटुम्बकेश्वर" भी छपता है, जो बाद की लोक-वर्तनी है। संस्कृत पाठ में कुटुम्बेश्वर है और यह लेख वही नाम लेता है।
स्थानीय परंपरा इस मंदिर को सिंहपुरी में, कार्तिक चौक के पास, श्री गोवर्धननाथजी की हवेली से आगे बताती है।
संक्षेप में जानें
- शिव मोर का रूप लेकर कालकूट विष कण्ठ में धारण करते हैं।
- गंगा, यमुना और सरस्वती इसे ले जाने से मना करती हैं, और शिप्रा तैयार होती हैं।
- विष-लिंग को देखने वाला हर प्राणी मर जाता था, जिन्हें शिव ने दृष्टि से जिला दिया।
- शिव की आज्ञा से लकुलीश लिंग पर आरूढ़ होते हैं, और लिंग स्पर्श के योग्य हो जाता है।
कुटुम्बेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| नाम का अर्थ | कुटुम्ब (परिवार) के ईश्वर (शिव) |
| देवता | शिव, लिंग रूप में |
| मूल ग्रंथ | स्कन्दपुराण, आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 14 (5.2.14), कुल 41 श्लोक |
| 84 महादेव में क्रम | चौदहवाँ |
| वक्ता और श्रोता | शिव और पार्वती |
| कथा का स्थान | महाकालवन, कामेश्वर के सामने |
कुछ ब्लॉग-कथाओं में लिखा है कि विष कामेश्वर लिंग पर डाला गया। संस्कृत पाठ इससे अलग है: उसमें शब्द "पुरः" है, यानी विष कामेश्वर के सामने खड़े एक परम लिंग पर रखा गया। Tagare ने भी "in front of Kāmeśvara" अनुवाद किया है। "पुरः" का एक अर्थ "पूर्व दिशा में" भी हो सकता है, जिससे दिशा का अनुमान बनता है, पर पाठ उसे स्पष्ट नहीं करता, इसलिए "कामेश्वर के सामने" लिखना सबसे सुरक्षित है।
स्कन्दपुराण में कुटुम्बेश्वर महादेव की कथा क्या है?
शिव अध्याय की शुरुआत लिंग का नाम बताकर करते हैं:
कुटुंबेश्वरसंज्ञं तु देवं विद्धि चतुर्दशम् ।
यस्य दर्शनमात्रेण गोत्रवृद्धिश्च जायते ॥
अर्थ: कुटुम्बेश्वर नाम के देव को चौदहवाँ जानो; जिनके दर्शन मात्र से गोत्र की वृद्धि होती है (स्कन्दपुराण 5.2.14.1)।
कालकूट विष और मोर का रूप
अध्याय का आरंभ भयंकर कालकूट विष से होता है, जो अपनी ज्वालाओं से डरावना था। देवता और असुर उसकी ज्वाला से डर गए। देवताओं पर कृपा करके शिव ने मोर का रूप लिया और विष को कण्ठ में धारण किया:
मायूरं रूपमास्थाय देवानामनुकंपया ।
कंठे धृतं महारौद्रं कालकूटाह्वयं तदा ॥
अर्थ: देवताओं पर कृपा करके मोर का रूप लेकर उन्होंने तब कालकूट नाम का अत्यन्त भयंकर विष कण्ठ में धारण किया (स्कन्दपुराण 5.2.14.9)।
फिर शिव पार्वती को बताते हैं कि वे दुःखी क्यों हुए। उनका रूप विषवृक्ष जैसा, पास जाने के अयोग्य था, उसे देखकर पार्वती डरकर भाग गई थीं, और इसी से वे दुःखी हुए (श्लोक 10)।
जिन नदियों ने मना किया
शिव ने गंगा से कहा कि कालकूट को वेग से महासागर तक ले जाओ, और गंगा ने उत्तर दिया कि उसमें ले जाने की शक्ति नहीं है। यमुना और सरस्वती भी समर्थ नहीं थीं। तब शिव ने ब्रह्मा से उत्पन्न शिप्रा से कहा।
शिप्रा विष को महाकालवन ले जाती हैं
शिव ने शिप्रा से कहा कि पुत्री, मेरी आज्ञा से महाकालवन जाओ, कालकूट को ले जाओ और कामेश्वर के सामने स्थित परम लिंग पर रख दो:
शिप्रे पुत्रि ममादेशान्महाकालवनं व्रज ।
गृहीत्वा कालकूटं तु पुरः कामेश्वरस्य हि ॥
विद्यते परमं लिंगं तस्मिँल्लिंगे नियोजय ।
अर्थ: हे शिप्रे, पुत्री, मेरी आज्ञा से महाकालवन जाओ, कालकूट लेकर कामेश्वर के सामने जो परम लिंग है उस लिंग पर रख दो (स्कन्दपुराण 5.2.14.16 से 17)।
विष-लिंग
शिप्रा ने विष लिंग के मस्तक पर रखा। इससे विष-लिंग बना, जिसे देखना मृत्यु देने वाला था। पशु, पक्षी और मनुष्य मर गए, और तीर्थयात्रा पर आए तपस्वी भी। शिव ने सबको दृष्टि से जीवित कर दिया।
ब्राह्मणों ने केवल प्रजा की रक्षा माँगी। शिव ने कहा कि लिंग क्षेम और आरोग्य देने वाला होगा, और एक शर्त जोड़ी:
कायावरोहणाद्विप्राः स्वयमत्रागमिष्यति ।
लकुलीशस्तदा चायं देवः स्पृश्यो भविष्यति ॥
अर्थ: हे विप्रो, कायावरोहण से लकुलीश स्वयं यहाँ आएँगे; तब यह देव स्पर्श के योग्य होगा (स्कन्दपुराण 5.2.14.30 से 31)।
लकुलीश लिंग पर आरूढ़ होते हैं
शिव ने कहा कि लिंग संसार में कुटुम्बेश्वर नाम से प्रसिद्ध होगा। फिर शिव की आज्ञा से लकुलीश उस लिंग पर आरूढ़ हुए, जिससे संसार में विस्मय हुआ और जनपद में उनकी कीर्ति फैली।
स्कन्दपुराण कुटुम्बेश्वर महादेव की पूजा का क्या फल बताता है?
अध्याय में ये फल गिनाए गए हैं:
- दर्शन मात्र से गोत्र की वृद्धि होती है (आरंभिक श्लोक में, और लकुलीश के आने के बाद फिर कही गई बात)।
- जो आश्विन कृष्ण पंचमी को लिंग के दर्शन करता है, वह निःसंदेह बहुत पुत्रों और बहुत धन वाला होता है।
- दर्शनार्थी महती श्री और रोगमुक्ति पाता है, और शिवलोक जाता है।
- दर्शन से पाप से मुक्ति मिलती है।
- जो रविवार या सोमवार को एकाग्र मन से शिप्रा में स्नान करके अष्टमी या चतुर्दशी को कुटुम्बेश्वर के दर्शन करता है, उसे हज़ार राजसूय और सौ वाजपेय यज्ञों का फल मिलता है।
कुटुम्बेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें कथा से मेल नहीं खातीं?
कुटुम्बेश्वर महादेव की कथा कई जगह बदले हुए रूप में सुनाई जाती है। जो बातें स्कन्दपुराण के पाठ से मेल नहीं खातीं, वे यहाँ हैं।
| प्रचलित बात | स्कन्दपुराण की कथा में | स्थिति |
|---|---|---|
| विष हालाहल था | अध्याय में हर जगह नाम कालकूट है | कथा के विरुद्ध |
| शिव ने मोर बनकर विष पी लिया | मोर का रूप लेकर विष कण्ठ में धारण किया; "पीना" और "नीलकण्ठ" शब्द नहीं आते | अंशतः कथा में |
| शिव विष की ज्वाला सह नहीं पाए | ज्वाला से देवता और असुर डरे; शिव इसलिए दुःखी हुए कि पार्वती उनका रूप देखकर डरकर भागीं | कथा के विरुद्ध |
| शिव ने विष सीधे शिप्रा को दिया | पहले गंगा ने, फिर यमुना, सरस्वती और अन्य नदियों ने मना किया; तब ब्रह्मा से उत्पन्न शिप्रा से कहा गया | अंशतः कथा में |
| शिप्रा ने विष कामेश्वर लिंग पर चढ़ाया | उन्होंने उसे कामेश्वर के सामने स्थित परम लिंग पर रखा | कथा के विरुद्ध |
| केवल ब्राह्मण मरे | पशु, पक्षी, मनुष्य और तीर्थयात्रा पर आए तपस्वी भी मरे | अंशतः कथा में |
| लकुलीश वंश के ब्राह्मण आए और पूजन किया | लकुलीश स्वयं आए और शिव की आज्ञा से लिंग पर आरूढ़ हुए | कथा के विरुद्ध |
| शिव ने मृतकों को जिलाकर तुरंत कुटुम्ब-वृद्धि का वर दिया | शिव की दृष्टि से वे जीवित हुए; लिंग क्षेम और आरोग्य देगा, और कुटुम्ब-वृद्धि लकुलीश के आने के बाद की बात है | अंशतः कथा में |
| सोमवार, प्रदोष और महाशिवरात्रि विशेष दिन हैं | पाठ में आश्विन कृष्ण पंचमी, तथा रविवार या सोमवार को अष्टमी या चतुर्दशी के दिन दर्शन आते हैं; प्रदोष और महाशिवरात्रि का नाम नहीं | अंशतः कथा में |
| लिंग नकारात्मक ऊर्जा का नाश और मानसिक शांति देता है | पाठ में कुटुम्ब-वृद्धि, पुत्र, धन, समृद्धि, रोगमुक्ति, पापमुक्ति और शिवलोक की बात है | बाद का शब्द-प्रयोग |
Tagare अध्याय 82 (कायावरोहणेश्वर) की टिप्पणी में कायावरोहण को आज का कारवान मानते हैं, जो गुजरात के वडोदरा ज़िले में है और लकुलीश की जन्मभूमि थी। लकुलीश को शिव का 28वाँ अवतार और पाशुपत सम्प्रदाय का संस्थापक माना जाता है। वही टिप्पणी पुराण-लेखक के संस्करण को "garbled" कहती है, क्योंकि वहाँ कायावरोहण महाकालवन के दक्षिण में स्थित एक लिंग का नाम बन गया है। उज्जैन की अपनी परंपरा में भी 82वें स्थान पर कायावरोहणेश्वर हैं, जो करोहण गाँव में बताए जाते हैं।
कौण्डिन्य के पाशुपतसूत्र-भाष्य (विद्वान इसे लगभग चौथी से छठी शताब्दी ई. का मानते हैं) में कहा गया है कि शिव ने कायावतरण में ब्राह्मण का शरीर धारण किया, पैदल उज्जयिनी पहुँचे और अपने पहले शिष्य कुशिक को दीक्षा दी। यानी लकुलीश का उज्जैन आना पाशुपत परम्परा में दर्ज बात है। आज के कुटुम्बेश्वर मंदिर में लकुलीश की मूर्ति या पाशुपत साधना का वर्णन किसी विश्वसनीय स्रोत में नहीं मिला।
कुटुम्बेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?
गंगा, यमुना और सरस्वती ने विष लेने से क्यों मना किया?
शिव ने गंगा से कहा कि कालकूट को वेग से महासागर तक ले जाओ, और गंगा ने उत्तर दिया कि उसमें ले जाने की शक्ति नहीं है। यमुना, सरस्वती और अन्य नदियाँ भी समर्थ नहीं थीं। तब ब्रह्मा से उत्पन्न शिप्रा से कहा गया। शिव ने वचन दिया कि पृथ्वी और पाताल के सब तीर्थ उसकी सेवा में आएँगे।
शिव ने मोर का रूप ही क्यों लिया?
अध्याय केवल इतना कहता है कि देवताओं पर कृपा करके शिव ने मोर का रूप लिया, और मोर का कारण नहीं देता। व्याख्याकार कुछ संबंध बताते हैं: मोर को विषैले साँप खाने वाला माना जाता है, और योग परम्परा कहती है कि मयूरासन का साधक कालकूट पचा सकता है। ये व्याख्याएँ हैं, पाठ के कथन नहीं।
यह कथा प्रचलित नीलकण्ठ कथा से कैसे अलग है?
प्रचलित कथा में शिव विष पी लेते हैं, वह कण्ठ में रहता है और वे नीलकण्ठ कहलाते हैं। अध्याय 14 में शिव कालकूट को कण्ठ में धारण तो करते हैं, पर फिर शिप्रा उसे एक लिंग तक पहुँचाती हैं। अध्याय में नीलकण्ठ नाम नहीं आता, इसलिए यह अलग स्थानीय परम्परा है।
क्या आज का मंदिर वही जगह है जिसका पुराण में वर्णन है?
कुटुम्बेश्वर के आज के मंदिर की पहचान परंपरा पर टिकी है। श्लोक 38 कहता है कि पास में शिप्रा नदी है, बावड़ी और कुएँ के साथ, और लिंग कामेश्वर के सामने है। सिंहपुरी इन दोनों संकेतों से मेल खाती है, यह किसी स्रोत से सिद्ध नहीं है, इसलिए मिलान श्रद्धा का विषय है।
उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में कुटुम्बेश्वर चौदहवें क्यों हैं?
आवन्त्यखण्ड में अध्याय 13 (कामेश्वर) इस वाक्य पर खत्म होता है: "अब कुटुम्बेश्वर की शक्ति सुनो।" अध्याय 14 कुटुम्बेश्वर का है। तीर्थ-नामों की सूची (5.1.70) में भी यही क्रम है: कामेश्वर नाम से प्रसिद्ध लिंग, उसके बाद कुटुम्बेश्वर।
अध्याय 14 में 41 श्लोक हैं। उसका अंतिम चरण श्रोता को इन्द्रद्युम्नेश्वर की कथा सुनने को कहता है। समापन-वाक्य उसे कुटुम्बेश्वर माहात्म्य का वर्णन करने वाला चौदहवाँ अध्याय कहता है। पूरे क्रम के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।
कुटुम्बेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?
अगला अध्याय 15 इन्द्रद्युम्नेश्वर का है। ठीक पहले तेरहवें स्थान पर कामेश्वर हैं।
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