कामेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?
कामेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में तेरहवाँ शिवलिंग है, जिसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के 13वें अध्याय में मिलती है। शिव से भस्म होने के बाद अनंग कामदेव ने अवन्ती में इस लिंग की आराधना की। लिंग ने उन्हें वरदान दिए और कहा कि वह उनके नाम कामेश्वर से प्रसिद्ध होगा।
लोक में इस लिंग को मनकामेश्वर या मनकामनेश्वर कहा जाता है, और कुछ कथा-सारों में कंदर्पेश्वर। पुराण का अपना नाम कामेश्वर यानी "काम के ईश्वर" है, और यह लेख पूरे समय वही नाम लेता है।
स्थानीय परंपरा इस मंदिर को शिप्रा के गंधर्व घाट पर बताती है।
संक्षेप में जानें
- कामदेव ब्रह्मा के मन से जन्मे, और ब्रह्मा के शाप में शिव का नेत्र उनका अंत बनता है।
- ब्रह्मा उन्हें बारह स्थान, पुष्प-धनुष और पाँच बाण देते हैं।
- शिव उन्हें भस्म करते हैं, और एक अशरीरी वाणी रति से रोने को मना करती है।
- अवन्ती का लिंग उनसे कहता है कि वे कृष्ण के पुत्र बनकर जन्म लेंगे, और लिंग उनके नाम से जाना जाएगा।
कामेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| नाम का अर्थ | काम के ईश्वर (शिव), कामदेव के नाम पर |
| देवता | शिव, लिंग रूप में |
| मूल ग्रंथ | स्कन्दपुराण, आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 13 (5.2.13) |
| 84 महादेव में क्रम | तेरहवाँ |
| वक्ता और श्रोता | श्री हर (शिव) और पार्वती |
| कथा का स्थान | अवन्ती, जहाँ कामदेव लिंग के दर्शन करते हैं |
तीर्थ-नामों की सूची (5.1.70) में लोकपालेश्वर के ठीक बाद वाले कामेश्वर के अलावा एक और कामेश्वर और एक मनःकामेश्वर अलग लिंगों के रूप में आते हैं। उसी अध्याय में मनःकामेश्वर गणेश का विशेषण भी है। इसलिए लोक-नाम मनकामेश्वर को पुराण के मनःकामेश्वर से जोड़ना ठीक नहीं। संभव है यह "मन की कामना के ईश्वर" वाले लोक-अर्थ से आया हो, क्योंकि पाठ में लिंग को मनचाहे फल देने वाला कहा गया है, पर यह अनुमान है, प्रमाण नहीं।
स्कन्दपुराण में कामेश्वर महादेव की कथा क्या है?
ब्रह्मा के मन से कामदेव का जन्म
ब्रह्मा प्रजा की सृष्टि की इच्छा से ध्यान में थे, तभी सूर्य जैसी कांति वाला, आभूषणों से सजा एक पुरुष प्रकट हुआ। ब्रह्मा ने पूछा कि तुम कौन हो, और कहा कि तुम मन्मथ के लक्षणों वाले कंदर्प लगते हो। उसने उत्तर दिया कि वह ब्रह्मा की सृष्टि-इच्छा से, उनकी मानसिक शक्ति से जन्मा है, और आज्ञा माँगी।
ब्रह्मा का आदेश और शाप
ब्रह्मा ने कहा कि मेरे रचे प्रजापति संतान उत्पन्न करने में समर्थ नहीं हैं, और आदेश दिया:
त्वमग्रणीः प्रजासर्गे त्वदधीनमिदं जगत् ।
कुरु सृष्टिं विचित्रां च कंदर्प मम शासनात् ॥
अर्थ: प्रजा की सृष्टि में तुम अग्रणी हो, यह जगत तुम्हारे अधीन है; हे कंदर्प, मेरी आज्ञा से विचित्र सृष्टि रचो (स्कन्दपुराण 5.2.13.7)।
आदेश सुनते ही स्मर अदृश्य हो गया। क्रुद्ध ब्रह्मा ने शाप दिया: "तुम भव (शिव) के नेत्र से निकली अग्नि से नष्ट होगे।" कंदर्प ने क्षमा माँगी।
बारह स्थान, पुष्प-धनुष और पाँच बाण
कंदर्प की भक्ति से प्रसन्न ब्रह्मा ने उसे रहने के लिए बारह स्थान दिए, और प्रेम के लिए मधु और माधव मास भी। फिर मन्मथ को पुष्प का धनुष और पाँच बाण दिए। रति और प्रीति के साथ काम ने तीनों लोक जीत लिए।
कामदेव शिव के पास
तब काम ने सोचा कि शंकर को कौन विचलित कर सकता है। वह रति और मित्र मधु (वसंत) के साथ उस स्थान पर गया जहाँ शिव तपस्या कर रहे थे, और उसने "मोहन" नाम का बाण चलाया। शिव ने क्रोध में तीसरा नेत्र खोला, और कंदर्प भस्म हो गया।
रति का विलाप और अशरीरी वाणी
रति वहीं थी। वह रोने लगी: "हे नाथ, हे प्राण, मुझे क्यों छोड़ते हो?" एक अशरीरी वाणी ने कहा: "हे विशाल नेत्रों वाली, रोओ मत। देवों के स्वामी शिव की कृपा से तुम्हारा पति फिर जीवित उठेगा।"
इसके बाद शिव से प्रार्थना की गई कि पृथ्वी पर सृष्टि रुक गई है, इसका पति इसे लौटा दीजिए।
शिव का कथन और अवन्ती का लिंग
शिव ने रति से कहा कि काम अब अनंग होकर, बिना शरीर के, प्राणियों में विचरेगा, और जब वह अवन्ती के लिंग की सेवा करेगा तब उसे फिर जीवित किया जाएगा। देवताओं के निर्देश पर काम अवन्ती गया और वहाँ मनचाहे फल देने वाले महान लिंग के दर्शन किए।
लिंग ने प्रसन्न होकर उससे वरदान की बात कही। उसने कहा: "हे काम, मैं सदा तुम्हारे नाम से प्रसिद्ध होऊँगा।" इसीलिए वह कामेश्वर है।
कामदेव का आश्रम
कामदेव ने लिंग के पास ही अपना आश्रम बनाया। अध्याय का समापन यह कहकर होता है कि शिव ने उसे आशीर्वाद दिया और अपने पास यहीं स्थान दिया। अगला अध्याय कुटुम्बेश्वर का है।
स्कन्दपुराण कामेश्वर महादेव की पूजा का क्या फल बताता है?
अध्याय के अंतिम श्लोकों में ये फल गिनाए गए हैं:
- दर्शन मात्र से उत्तम आनंद और सौभाग्य मिलता है (यह बात आरम्भिक श्लोक में कही गई है)।
- भक्ति से दर्शन करने वालों को शाश्वत आनंद देने वाली गति मिलती है।
- वे दीर्घायु होते हैं, उन्हें सुंदर रूप मिलता है और उनका कुल निर्मल रहता है।
- उन्हें महान समृद्धि और उत्तम सुख मिलता है, दिव्य कलाओं वाली पत्नियाँ मिलती हैं और संतान रोगरहित रहती है।
- जो चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को भक्ति से शिव के दर्शन करते हैं, वे देवलोक पाकर आनंदित होते हैं। वे यक्ष, गणेश्वर और सिद्ध बनकर विमानों से रुद्रलोक जाते हैं।
- अध्याय का समापन इसे कामेश्वर की पाप-नाशक शक्ति कहकर करता है।
दीर्घायु, रूप और कुल वाली बात कामदेव को संबोधित करके कही गई है:
दीर्घायुषो भविष्यंति रूपं तेषां भविष्यति ।
कुलं च निर्मलं तेषां ये त्वां पश्यंति मन्मथ ॥
अर्थ: हे मन्मथ, जो तुम्हें देखते हैं वे दीर्घायु होंगे, उन्हें रूप मिलेगा और उनका कुल निर्मल होगा (स्कन्दपुराण 5.2.13.50)।
कामेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें कथा से मेल नहीं खातीं?
कामेश्वर महादेव की कथा कई जगह बदले हुए रूप में सुनाई जाती है। जो बातें स्कन्दपुराण के पाठ से मेल नहीं खातीं, वे यहाँ हैं।
| प्रचलित बात | स्कन्दपुराण की कथा में | स्थिति |
|---|---|---|
| आकाशवाणी ने कामदेव को महाकाल वन जाने को कहा | वाणी केवल रति से रोने को मना करती है; अवन्ती के लिंग की बात शिव कहते हैं, और काम देवताओं के निर्देश पर जाता है | कथा के विरुद्ध |
| कामदेव ने महाकाल वन में शिव की समाधि भंग की | दहन का कोई स्थान नहीं बताया गया; अवन्ती बाद में आती है, जब काम लिंग के दर्शन करता है | कथा में नहीं |
| बारहों स्थान स्त्री-शरीर में हैं | सात शरीर के अंग हैं; बाकी युवतियाँ, वसंत, कोयल की कूक, चाँदनी और वर्षा हैं | अंशतः कथा में |
| कामदेव ने सीधे शिव की तपस्या भंग की | वह सूक्ष्म रूप में शिव के हृदय में घुसा, फिर आम के पेड़ के नीचे से "मोहन" बाण चलाया | अंशतः कथा में |
| कामदेव ने गंधर्ववती घाट पर लिंग देखा | पाठ में केवल अवन्ती है; कोई घाट या नदी नहीं | कथा में नहीं |
| शिव ने इस स्थान को अमर कर दिया | लिंग कामदेव के नाम से प्रसिद्ध रहेगा, और काम उसके पास आश्रम बनाता है | कथा के विरुद्ध |
| चैत्र शुक्ल त्रयोदशी को घाट पर पूजा से सीधे देवलोक मिलता है | भक्त पहले देवलोक में आनंद पाते हैं, फिर यक्ष, गणेश्वर और सिद्ध बनकर रुद्रलोक जाते हैं; "सीधे" और घाट की शर्त पाठ में नहीं | अंशतः कथा में |
| लिंग मानसिक शांति, सकारात्मक ऊर्जा और कष्ट-निवारण देता है | पाठ में आनंद, सौभाग्य, समृद्धि और पाप-नाश की बात है | बाद का शब्द-प्रयोग |
| सोमवार, प्रदोष और महाशिवरात्रि विशेष दिन हैं | इस अध्याय में इनमें से किसी का नाम नहीं | लोक-मान्यता |
Tagare की अपनी भूमिका के अनुसार इस खण्ड का लेखक कभी पुरानी पौराणिक कथा को अपने प्रयोजन के अनुसार बदलता है या नई कथा जोड़ता है। अध्याय काम-दहन की प्रसिद्ध कथा को उज्जैन के लिंग पर ले जाकर खत्म करता है। दहन को वह किसी जगह से नहीं जोड़ता, इसलिए उसे उज्जैन के किसी स्थान से बाँधने का पाठ में आधार नहीं है।
कामेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?
ब्रह्मा ने कामदेव को कौन-से बारह स्थान दिए?
ब्रह्मा ने कंदर्प की भक्ति से प्रसन्न होकर बारह स्थान दिए। सात स्त्री-शरीर के अंग हैं: कटाक्ष, केश, नितंब, स्तन, नाभि, कक्ष और पल्लव जैसा अधर। बाकी पाँच हैं युवतियाँ, वसंत, कोयल की कूक, चाँदनी और वर्षा का आगमन। साथ में प्रेम के लिए मधु और माधव मास भी दिए।
कामदेव शिव के हृदय तक कैसे पहुँचा?
काम कृमि जैसा सूक्ष्म रूप धरकर शिव के हाथ के छिद्र से हृदय में घुस गया। शिव कहते हैं कि उसी क्षण उन्हें पार्वती का स्मरण हुआ। उन्होंने धैर्य पाया और प्रत्याहार तथा धारणा से काम को भीतर ही जलाना चाहा। काम बच निकला और आम के पेड़ के नीचे से मोहन बाण चलाया।
इस अध्याय में कामदेव किस रूप में जन्म लेते हैं?
लिंग कामदेव से कहता है कि अंगहीन होकर भी वह समर्थ रहेगा। वह कृष्ण और रुक्मिणी के पुत्र शम्बरसूदन के रूप में जन्म लेगा, जिसे परम्परा प्रद्युम्न के नाम से जानती है। अध्याय जन्म का वर्णन नहीं करता। वरदानों का अंत लिंग के इस वचन पर होता है कि वह कामदेव के नाम से जाना जाएगा।
क्या आज का मंदिर वही जगह है जिसका पुराण में वर्णन है?
कामेश्वर के आज के मंदिर की पहचान परंपरा पर टिकी है। अध्याय में केवल अवन्ती और "महान लिंग" का नाम है, कोई घाट, नदी या मोहल्ला नहीं। इसलिए पाठ का मिलान गंधर्व घाट या किसी और आज के स्थान से नहीं हो सकता, और मंदिर वही है या नहीं, यह श्रद्धा का विषय है।
उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में कामेश्वर तेरहवें क्यों हैं?
आवन्त्यखण्ड में अध्याय 12 लोकपालेश्वर का, अध्याय 13 कामेश्वर का और अध्याय 14 कुटुम्बेश्वर का है। स्कन्दपुराण की तीर्थ-नामों की अलग सूची (5.1.70) में भी यही क्रम है: लोकपालेश्वर, फिर कामेश्वर नाम से प्रसिद्ध लिंग, उसके बाद कुटुम्बेश्वर।
आज की 84 महादेव सूचियाँ भी कामेश्वर को तेरहवें स्थान पर रखती हैं। पूरे क्रम के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।
कामेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?
अगला अध्याय 14 कुटुम्बेश्वर का है। ठीक पहले बारहवें स्थान पर लोकपालेश्वर हैं।
टिप्पणियाँ
अभी कोई टिप्पणी नहीं। पहले अपने विचार साझा करें!
टिप्पणी करें