इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?
इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में पन्द्रहवाँ शिवलिंग है, जिसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के 15वें अध्याय में मिलती है। राजा इन्द्रद्युम्न पृथ्वी पर कीर्ति नष्ट होने से स्वर्ग से गिरते हैं। वे महाकालवन के एक लिंग का पूजन करते हैं, कीर्ति निर्मल होती है और लिंग उनके नाम से प्रसिद्ध होता है।
नाम में राजा इन्द्रद्युम्न और ईश्वर जुड़े हैं। कहीं "इंद्रदयुम्नेश्वर" या "Indra Dhumeshwar" भी छपा मिलता है; ये वर्तनी की गलतियाँ हैं, और यह लेख इन्द्रद्युम्नेश्वर ही लिखता है।
स्थानीय परंपरा इस मंदिर को पटनी बाजार में, मोदी की गली में, खोखो माता मंदिर से पहले बताती है।
संक्षेप में जानें
- पृथ्वी पर कीर्ति नष्ट होने पर राजा इन्द्रद्युम्न स्वर्ग से गिर जाते हैं।
- मार्कण्डेय ऋषि उन्हें महाकालवन के एक पापहर लिंग के पास भेजते हैं।
- पूजन के बाद देवता उनकी कीर्ति को निर्मल कहते हैं और लिंग को उनका नाम देते हैं।
- पाठ दर्शन और पूजन से यश, पुण्य और स्वर्ग का फल बताता है।
इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| नाम का अर्थ | राजा इन्द्रद्युम्न के नाम पर पड़ा शिव का नाम |
| देवता | शिव, लिंग रूप में |
| मूल ग्रंथ | स्कन्दपुराण, आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 15 (5.2.15), कुल 28 श्लोक |
| 84 महादेव में क्रम | पन्द्रहवाँ |
| वक्ता और श्रोता | शिव और पार्वती |
| कथा का स्थान | महाकालवन, कल्कलेश्वर के समीप बाईं ओर |
स्कन्दपुराण में इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव की कथा क्या है?
शिव अध्याय की शुरुआत लिंग का नाम बताकर करते हैं:
इंद्रद्युम्नेश्वरं विद्धि शिवं पंचदशं प्रिये ।
यस्य दर्शनमात्रेण यशः कीर्तिश्च जायते ॥
अर्थ: हे प्रिये, इन्द्रद्युम्नेश्वर शिव को पन्द्रहवाँ जानो; जिनके दर्शन मात्र से यश और कीर्ति उत्पन्न होती है (स्कन्दपुराण 5.2.15.1)।
स्वर्ग से गिरा राजा
पृथ्वीपति इन्द्रद्युम्न ने पृथ्वी की रक्षा वैसे की जैसे पिता अपने औरस पुत्र की करता है। उसने भरपूर दक्षिणा वाले अनेक यज्ञ किए और स्वर्ग गया।
फिर पृथ्वी पर उसकी कीर्ति नष्ट हो गई। पुण्य चुक जाने से वह अचानक भूमि पर गिरा और शोक में डूब गया।
हिमालय में पूछा गया प्रश्न
राजा ने सोचा कि यह क्या हुआ, फिर वह हिमालय गया, जहाँ महामुनि मार्कण्डेय तीव्र तप कर रहे थे। उसने साष्टांग प्रणाम किया और विनय से पूछा कि स्थायी कीर्ति कैसे मिलती है, और क्या वह तप के फल से आती है।
मार्कण्डेय का उत्तर
मार्कण्डेय ने उसे तप करने को नहीं कहा। उन्होंने कहा कि जब तक तुम्हारी कीर्ति पृथ्वी पर रहेगी, तब तक तुम देवताओं के साथ रहोगे, इसलिए शीघ्र उत्तम महाकालवन जाओ। वहाँ एक पापहर लिंग पहले से स्थित है:
कल्कलेश्वरदेवस्य समीपे वामभागतः ।
लिंगं पापहरं तत्र समाराधय यत्नतः ॥
अर्थ: कल्कलेश्वर देव के समीप, बाईं ओर, पापहर लिंग है; वहाँ यत्नपूर्वक आराधना करो (स्कन्दपुराण 5.2.15.18)।
मार्कण्डेय ने कहा कि उसके पूजन से उत्तम कीर्ति और सनातन स्वर्ग मिलेगा।
देवता लिंग को नाम देते हैं
राजा ने जाकर उस लिंग का पूजन किया। तब विमानों में बैठे देवता और गंधर्व बोले, "इस लिंग के पूजन से तुम्हारी कीर्ति निर्मल हो गई है।" उन्होंने ही लिंग को उसका नाम भी दिया:
अद्यप्रभृति राजेंद्र लिंगं त्वन्नाम नामतः ।
ख्यातिं यास्यति लोकेऽस्मिन्निंद्रद्युम्नेति निश्चितम् ॥
अर्थ: हे राजेन्द्र, आज से यह लिंग तुम्हारे नाम से इस लोक में इन्द्रद्युम्नेश्वर के रूप में प्रसिद्ध होगा; यह निश्चित है (स्कन्दपुराण 5.2.15.22)।
देवताओं ने भी लिंग का पूजन किया और इन्द्रद्युम्न के साथ स्वर्ग लौट गए। अंत में शिव इसे लिंग का पापनाशक प्रभाव बताते हैं और पार्वती से कहते हैं कि अब दूसरा सुनो।
स्कन्दपुराण इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव के पूजन का क्या फल बताता है?
अध्याय ये फल गिनाता है:
- लिंग के दर्शन मात्र से यश और कीर्ति मिलती है (आरंभिक श्लोक)।
- पूजन करने वाले सब पापों से मुक्त होते हैं, इच्छा पूरी करने वाले विमानों में स्वर्ग जाते हैं और देवताओं व ऋषियों से स्तुति पाते हैं। संसार में कुछ भी उनके लिए दुर्लभ नहीं रहता।
- लोभवश या प्रसंगवश दर्शन करने वालों को भी कीर्ति, यश, पुण्य और धर्म मिलता है।
- जब तक चौदह इन्द्र रहते हैं, तब तक उनका स्वर्ग से पतन नहीं होता।
- जो विशेष रूप से चतुर्दशी को पूजा करते हैं, वे अपने मातृ और पितृ दोनों कुलों का उद्धार करते हैं।
न स्वर्गात्पतनं तेषां यावदिंद्राश्चतुर्द्दश ।
ये च पूजां करिष्यंति चतुर्दश्यां विशेषतः ।
ते कुलं तारयिष्यंति मातृकं पैतृकं सदा ॥
अर्थ: जब तक चौदह इन्द्र हैं, तब तक उनका स्वर्ग से पतन नहीं होता; और जो विशेष रूप से चतुर्दशी को पूजा करेंगे, वे माता और पिता के कुल को सदा तारेंगे (स्कन्दपुराण 5.2.15.26)।
इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव के बारे में कौन-सी प्रचलित बातें पाठ से मेल नहीं खातीं?
इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव की कथा अक्सर बदलकर सुनाई जाती है। ये वे बातें हैं जो स्कन्दपुराण से मेल नहीं खातीं।
| प्रचलित बात | स्कन्दपुराण में क्या है | स्थिति |
|---|---|---|
| शिव राजा के सामने प्रकट होकर लिंग बने | लिंग महाकालवन में पहले से है; कथा में शिव प्रकट नहीं होते | पाठ के विपरीत |
| राजा ने हिमालय पर कठोर तपस्या की | तप मार्कण्डेय कर रहे थे; राजा ने प्रणाम करके प्रश्न पूछा | पाठ के विपरीत |
| मार्कण्डेय ने महाकाल की पूजा के लिए भेजा | उन्होंने महाकालवन में कल्कलेश्वर के समीप बाईं ओर स्थित पापहर लिंग के पास भेजा | पाठ के विपरीत |
| शिव ने लिंग को राजा के नाम पर रखने का वचन दिया | नाम विमानों में बैठे देवताओं और गंधर्वों ने दिया | पाठ के विपरीत |
| पुण्य क्षीण होने से वह गिरा | पृथ्वी पर कीर्ति नष्ट होने पर वह गिरा, और उसका पुण्य भी जा चुका था | पाठ में आंशिक |
| वह अवन्ती का राजा था जिसने जगन्नाथ मंदिर बनवाया | अध्याय में किसी राज्य या नगर का नाम नहीं है; "महीपति" राजा का विशेषण है | पाठ में नहीं |
| कथा में उल्लू, बगुला और कछुआ आते हैं | ये महाभारत वाली कथा के पात्र हैं; इस अध्याय में कोई नहीं है | अन्य ग्रंथ की कथा |
| लिंग रोग मिटाता है और कायिक, वाचिक, मानसिक कष्ट, भय, तनाव और नकारात्मक ऊर्जा दूर करता है | पाठ में यश, कीर्ति, पुण्य, धर्म, पापमुक्ति, स्वर्ग और दोनों कुलों का उद्धार है | बाद की भाषा |
| नियमित अभिषेक और विशेष अनुष्ठान ज़रूरी हैं | अध्याय में केवल पूजा, अर्चन और दर्शन का उल्लेख है | पाठ में नहीं |
यह इन्द्रद्युम्न महाभारत और जगन्नाथ कथा के राजाओं से कैसे अलग है?
इन्द्रद्युम्न नाम एक से ज़्यादा कथाओं में आता है। तीन आसानी से आपस में उलझ जाती हैं।
| बिंदु | महाभारत, वनपर्व | जगन्नाथ कथा, स्कन्दपुराण | उज्जैन, स्कन्दपुराण 5.2.15 |
|---|---|---|---|
| राजा | राजर्षि | कृतयुग का सूर्यवंशी राजा, "मालव देश की अवन्ती नगरी" का | केवल "महीपति", यानी पृथ्वीपति |
| पतन | पुण्य घटने पर स्वर्ग से गिरे और चिल्लाए, "मेरे कर्म नष्ट हो गए!" | कथा में स्वर्ग से पतन नहीं है | पृथ्वी पर कीर्ति नष्ट हुई और पुण्य भी गया |
| मार्कण्डेय की भूमिका | राजा को पहचानते नहीं; उसे उल्लू के पास ले जाते हैं | केंद्र में नहीं; मार्गदर्शक नारद हैं | हिमालय में राजा से मिलते हैं और महाकालवन भेजते हैं |
| अन्य पात्र | उल्लू प्रावारकर्ण, बगुला नाडीजंघ, कछुआ अकूपार | विद्यापति, नीलमाधव, ब्रह्मा, विश्वकर्मा | देवता और गंधर्व |
| कथा का अंत | अकूपार राजा को पहचानता है और वह स्वर्ग लौटता है | पुरी में मंदिर की स्थापना | राजा लिंग का पूजन करता है और देवताओं के साथ स्वर्ग लौटता है |
Tagare लिखते हैं कि जगन्नाथ वाला राजा उस इन्द्रद्युम्न से अलग है जो महाभारत में स्वर्ग से गिरा था। जगन्नाथ वाले राजा को उज्जैन के इस मंदिर से जोड़ने वाला कोई विश्वसनीय स्रोत नहीं मिला।
स्कन्दपुराण के माहेश्वर खंड (कौमारिका खंड) में महीसागर के संगम पर, गुजरात में, एक और इन्द्रद्युम्नेश्वर लिंग है। वह महाभारत वाली कथा का विस्तार है। वह उज्जैन के पन्द्रहवें महादेव से अलग लिंग है, इसलिए दोनों को न मिलाएँ।
श्लोक 3 के संस्कृत पाठ में "दृष्ट्वा" छपा है, जिसका अर्थ "देखकर" है। श्लोक का भाव यह है कि राजा ने अनेक यज्ञ किए और स्वर्ग गया, इसलिए यह शब्द संभवतः "इष्ट्वा" है, यानी "यज्ञ करके"। अध्याय का संस्कृत पाठ आलोचनात्मक संस्करण नहीं है, और ऐसी चूकें उसमें और जगह भी हो सकती हैं।
"चतुर्दश्यां विशेषतः" शब्द चतुर्दशी को पूजा का विशेष दिन बताते हैं। अध्याय में कोई मास, पक्ष या वार नहीं है। इस लिंग के लिए सोमवार या किसी पर्व का तय नियम बाद की परंपरा है।
इन्द्रद्युम्नेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?
कीर्ति नष्ट होने से राजा का स्वर्ग क्यों छिन गया?
पतन के बाद राजा सोचता है कि स्वर्ग में किए हुए कर्मों का फल ही भोगा जाता है। मनुष्य तब तक स्वर्ग में रहता है जब तक उस पुण्य कर्म का "शब्द", यानी कीर्ति, बना रहता है। जिसकी अकीर्ति गाई जाती है, वह निचले लोकों में गिरता है। इसीलिए मार्कण्डेय का उपाय कीर्ति से जुड़ा है।
क्या यह वही इन्द्रद्युम्न है जिसने पुरी का जगन्नाथ मंदिर बनवाया?
अध्याय ऐसा नहीं कहता। Tagare जगन्नाथ वाले राजा को, जो अवन्ती का पौराणिक राजा है और जिसने पुरी का मंदिर बनवाया, महाभारत में स्वर्ग से गिरे इन्द्रद्युम्न से अलग मानते हैं। अध्याय 15 में भी स्वर्ग से पतन है, महाभारत जैसा। जगन्नाथ वाले राजा को इस मंदिर से जोड़ने वाला कोई विश्वसनीय स्रोत नहीं है।
इन्द्रद्युम्न किस राज्य का राजा था?
अध्याय कोई राज्य नहीं बताता। वह उसे "महीपति", यानी पृथ्वीपति कहता है, और कहता है कि उसने पृथ्वी की रक्षा वैसे की जैसे पिता अपने औरस पुत्र की करता है। यह शब्द विशेषण है, स्थान का नाम नहीं। 28 श्लोकों में कोई नगर या देश नहीं आता, इसलिए उससे जुड़ा कोई भी राज्य दूसरी कथाओं से आया है।
क्या आज का मंदिर वही जगह है जिसका पुराण में वर्णन है?
पुराण लिंग को महाकालवन में, कल्कलेश्वर के समीप बाईं ओर रखता है। इन्द्रद्युम्नेश्वर के आज के मंदिर की पहचान परंपरा से, पटनी बाजार में होती है। यह किसी स्रोत से सिद्ध नहीं कि उसकी स्थिति कल्कलेश्वर की "बाईं ओर" से मेल खाती है, इसलिए पाठ और मंदिर का मिलान श्रद्धा का विषय है।
उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में इन्द्रद्युम्नेश्वर पन्द्रहवें क्यों हैं?
अध्याय 15 का संस्कृत पाठ स्वयं लिंग को "पंचदशं", यानी पन्द्रहवाँ कहता है। तीर्थ-नामों की सूची (5.1.70) में भी यही क्रम है: कामेश्वर नाम से प्रसिद्ध लिंग, उसके बाद कुटुम्बेश्वर, प्रसिद्ध इन्द्रद्युम्नेश्वर, फिर ईशानेश।
अध्याय 15 में 28 श्लोक हैं। उसका अंतिम चरण श्रोता को दूसरी कथा सुनने को कहता है, और आगे अध्याय 16 आता है। पूरे क्रम के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।
इन्द्रद्युम्नेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?
अगला अध्याय 16 ईशानेश्वर का है। ठीक पहले चौदहवें स्थान पर कुटुम्बेश्वर हैं।
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