लोकपालेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?
लोकपालेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में बारहवाँ शिवलिंग है, जिसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के 12वें अध्याय में मिलती है। दैत्यों से हारे चारों लोकपालों ने महाकालवन में इस लिंग की आराधना की। लिंग से ज्वाला उठी, उसने दैत्यों को भस्म कर दिया, और लिंग लोकपालेश्वर कहलाया।
नाम में दो शब्द हैं: लोकपाल (दिशाओं के रक्षक) और ईश्वर। पुराण कारण कथा में ही देता है: लोकपालों ने इस लिंग की सेवा की, इसलिए नाम उन्हीं पर पड़ा।
स्थानीय परंपरा इस मंदिर को पुराने शहर में, कार्तिक चौक से रघुवंशी मार्ग की दाईं ओर की गली में बताती है। यह क्षेत्र शीतला माता गली के नाम से भी जाना जाता है।
संक्षेप में जानें
- दैत्य हिरण्यकशिपु के वक्षःस्थल से हज़ारों गणों में निकले, किसी एक नायक का नाम नहीं है।
- चार लोकपाल नाम से आते हैं: इन्द्र, धर्मराज, वरुण और कुबेर।
- विष्णु ने दो बार सलाह दी, और दूसरी सलाह कापालिक वेश की थी।
- लिंग से एक ज्वाला उठी और दैत्य भस्म हो गए।
लोकपालेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| नाम का अर्थ | लोकपालों (दिशाओं के रक्षकों) के ईश्वर (शिव) |
| देवता | शिव, लिंग रूप में |
| मूल ग्रंथ | स्कन्दपुराण, आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 12 (5.2.12) |
| 84 महादेव में क्रम | बारहवाँ |
| वक्ता और श्रोता | श्री हर (शिव) और पार्वती |
| कथा का काल | केवल "पूर्वकाल में"; कोई कल्प या युग नहीं बताया गया |
| कथा का स्थान | महाकालवन |
पुराण के दूसरे अध्यायों में भी कापालिक प्रसंग हैं, और वे इस कथा से घुल-मिल जाते हैं। अध्याय 8 (कपालेश्वर) में स्वयं शिव कापालिक बनते हैं, वैवस्वत कल्प के त्रेतायुग के आरम्भ में। अध्याय 4 (डमरुकेश्वर) में रुरु-पुत्र वज्र की सेना शिव के डमरु-नाद से प्रकट लिंग द्वारा नष्ट होती है। अध्याय 12 में लोकपाल विष्णु की सलाह पर यह वेश धारण करते हैं।
स्कन्दपुराण में लोकपालेश्वर महादेव की कथा क्या है?
हिरण्यकशिपु के वक्षःस्थल से निकले दैत्य
शिव "पूर्वकाल में, हे सुन्दरी" कहकर कथा शुरू करते हैं। हिरण्यकशिपु के वक्षःस्थल से दैत्यों के हज़ारों गण निकले। पाठ में किसी एक दैत्य-नायक का नाम नहीं है।
दैत्यों ने पृथ्वी का क्या हाल किया
दैत्यों ने पूरी पृथ्वी पर कब्ज़ा किया, तपोवन और यज्ञ नष्ट किए। वेद-वेदांग जानने वाले ब्राह्मणों को उन्होंने खा लिया, यज्ञ-कुण्ड मदिरा और धूल से भर दिए और यज्ञ-पात्र तोड़ डाले। पृथ्वी पर वेदपाठ और वषट्, स्वधा, स्वाहा के उच्चार बंद हो गए।
लोकपाल विष्णु की शरण में
भयभीत लोकपाल माधव (विष्णु) की शरण में गए और हाथ जोड़कर बोले:
ऊचुः प्रांजलयः सर्वे क्षुधार्ता दुःखिताः कृताः ।
वयं ग्लानिं गता देव यज्ञभागं विना कृताः ॥
अर्थ: उन्होंने कहा, हे देव, यज्ञ-भाग न मिलने से हम भूखे, दुःखी और दुर्बल हो गए हैं (स्कन्दपुराण 5.2.12.7)।
विष्णु का प्रयास और लोकपालों की हार
विष्णु शंख, चक्र और गदा लेकर निकले। दैत्य समुद्र में छिप गए और रात में निकलकर ब्राह्मणों व तपस्वियों को मारने लगे। फिर उन्होंने लोकपालों को जीत लिया: स्वर्ग में शक्र (इन्द्र) को, दक्षिण में धर्मराज को, पश्चिम में जलों के राजा वरुण को और उत्तर में धनद (कुबेर) को।
दो सलाहें
विष्णु ने पहले कहा कि महाकालवन जाओ और एकाग्र मन, पवित्रता और भक्ति से शंकर की आराधना करो। रास्ते में सशस्त्र दैत्यों ने लोकपालों को रोक दिया, तो वे लौटकर जनार्दन के पास आए।
तब नारायण ने उन्हें ब्रह्मा के साथ कापालिक वेश में महाकालवन जाने को कहा। पाठ केवल इतना कहता है कि लोकपाल उसी वेश में वहाँ आए। ब्रह्मा के पहुँचने का अलग से वर्णन नहीं है।
ज्वाला और नामकरण
लोकपालों ने वहाँ तेज के अद्भुत पुंज जैसा महान लिंग देखा। उस लिंग से एक ज्वाला उठी, जिसने सब दानवों को जलाकर राख कर दिया।
शिव कहते हैं कि लोकपालों से विधिवत सेवित यह लिंग लोकपालेश्वर नाम से प्रसिद्ध होगा। देवता लोकपालों के संरक्षण में अपने-अपने लोक लौट गए।
स्कन्दपुराण लोकपालेश्वर महादेव की पूजा का क्या फल बताता है?
अध्याय के अंतिम श्लोकों में ये फल गिनाए गए हैं:
- लिंग के दर्शन मात्र से मनुष्य सब पापों से छूट जाता है (यह बात आरम्भिक श्लोक में कही गई है)।
- भक्त को हर जन्म में धन-संपन्नता मिलती है, और उसे दरिद्रता, महामारी या अकाल मृत्यु नहीं सताती।
- दर्शन के समय जो कामना हो वह पूरी होती है, और मृत्यु के बाद परम गति मिलती है।
- पूजा से विधि-पूर्वक किए गए अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है।
- संयोग से दर्शन करने वाला भी लोकपालों के साथ स्वर्ग में आनन्द पाता है।
- जो विषुव, सोमवार और विशेषकर दोनों अयनों की चतुर्दशी या अष्टमी को भक्ति से दर्शन करते हैं, वे युद्ध में शत्रुओं के लिए अजेय हो जाते हैं। मृत्यु के बाद वे विमान से शक्र (इन्द्र) के लोक जाते हैं, फिर क्रम से वरुणलोक, कुबेरलोक और ब्रह्मलोक।
दो अयन का अर्थ है सूर्य की वार्षिक यात्रा के दो भाग, उत्तरायण और दक्षिणायन।
लोकपालेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें कथा से मेल नहीं खातीं?
लोकपालेश्वर महादेव की कथा कई जगह बदले हुए रूप में सुनाई जाती है। जो बातें स्कन्दपुराण के पाठ से मेल नहीं खातीं, वे यहाँ हैं।
| प्रचलित बात | स्कन्दपुराण की कथा में | स्थिति |
|---|---|---|
| दैत्य हिरण्यकशिपु के समय में जन्मे | हज़ारों दैत्य-गण उसके वक्षःस्थल से निकले; किसी नायक का नाम नहीं | कथा के विरुद्ध |
| यज्ञकुण्ड मांस, मदिरा और रक्त से दूषित किए गए | कुण्ड मदिरा और धूल से भरे गए, पात्र तोड़े गए और ब्राह्मणों को खाया गया | अंशतः कथा में |
| दैत्यों ने दसों दिशाएँ छीन लीं | केवल चार लोकपालों के नाम हैं: इन्द्र, धर्मराज, वरुण, कुबेर | कथा में नहीं |
| विष्णु ने "वृषभरावन" को मारा था | असुर का नाम वृषपर्वा है; सूची है नमुचि, वृषपर्वा, मुर, हिरण्यकशिपु, नरक | कथा के विरुद्ध |
| लिंग के बीच से ज्वालाएँ दसों दिशाओं में फैलीं | लिंग से एक ज्वाला उठी | कथा के विरुद्ध |
| हर अष्टमी को दर्शन से विजय मिलती है | युद्ध में विजय विषुव, सोमवार और दोनों अयनों की चतुर्दशी या अष्टमी से जुड़ी है | अंशतः कथा में |
| लिंग आंतरिक शत्रुओं पर विजय देता है | पाठ युद्ध में शत्रुओं की बात करता है | कथा में नहीं |
| जल चढ़ाने से सब विघ्न दूर होते हैं, और सावन या शिवरात्रि मुख्य दिन हैं | जल चढ़ाने, किसी मास या पर्व का नाम पाठ में नहीं है | लोक-मान्यता |
Tagare की अपनी भूमिका के अनुसार इस खण्ड का लेखक कभी पुरानी पौराणिक कथा को अपने प्रयोजन के अनुसार बदलता है या नई कथा जोड़ता है। लोकपालेश्वर महादेव की कथा किसी लिंग की महिमा के परम्परागत वर्णन के रूप में ही कहनी चाहिए। उसमें कोई तिथि या दर्ज घटना नहीं है।
लोकपालेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?
कापालिक वेश में लोकपालों ने क्या धारण किया?
नारायण लोकपालों से कहते हैं कि खोपड़ियों से सजो, खट्वांग धारण करो और शांत भाव रखो। वे पंचमुद्राओं से सुसज्जित हों, हर अंग पर पवित्र भस्म लगाएँ, और पैरों में चमकती छोटी घंटियाँ तथा नूपुर बाँधें। इसी वेश में ब्रह्मा के साथ वे महाकालवन जाते हैं।
विष्णु पहले किन असुरों को मार चुके थे?
लोकपाल जब दैत्यों का वर्णन करते हैं, तो अध्याय पहले मारे गए असुरों की सूची देता है: नमुचि, वृषपर्वा, मुर, भयंकर हिरण्यकशिपु और नरक। हिरण्यकशिपु वही है जिसके वक्षःस्थल से नए दैत्य-गण निकले, इसलिए अध्याय उसे पहले का शत्रु मानता है। प्रचलित नाम "वृषभरावन" वृषपर्वा की गलत वर्तनी है।
इस कथा में कौन-सी दिशा किस लोकपाल की है?
अध्याय चार लोकपालों और उनकी दिशाओं के नाम बताता है। शक्र यानी इन्द्र स्वर्ग के, धर्मराज दक्षिण के, जलों के राजा वरुण पश्चिम के और धनद यानी कुबेर उत्तर के स्वामी हैं। अग्नि, निर्ऋति, वायु और ईशान का नाम नहीं आता, इसलिए अध्याय दस दिशाओं की गिनती नहीं करता।
क्या आज का मंदिर वही जगह है जिसका पुराण में वर्णन है?
लोकपालेश्वर महादेव के आज के मंदिर की पहचान परंपरा पर टिकी है। पुराण महाकालवन के भीतर कोई स्थल-चिह्न नहीं देता, केवल लिंग को तेज का पुंज बताता है। इसलिए पाठ और आज की गली का मिलान जाँचा नहीं जा सकता, और यह श्रद्धा का विषय है।
उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में लोकपालेश्वर बारहवें क्यों हैं?
आवन्त्यखण्ड में अध्याय 11 (सिद्धेश्वर) इस वाक्य पर खत्म होता है: "अब लोकपालेश्वर की कथा सुनो।" अध्याय 12 लोकपालेश्वर का है और अध्याय 13 का नाम कामेश्वर है।
स्कन्दपुराण में तीर्थ-नामों की एक अलग सूची भी है (5.1.70), जिसमें कर्कोटेश्वर के बाद सिद्धेश्वर, स्वर्गद्वारेश्वर रुद्र और फिर एक और लोकपालेश्वर आते हैं। उस सूची का क्रम भिन्न है। यात्रा में अध्याय का क्रम माना जाता है। पूरे क्रम के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।
लोकपालेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?
अगला अध्याय 13 कामेश्वर का है। ठीक पहले ग्यारहवें स्थान पर सिद्धेश्वर हैं।
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