स्वर्णज्वालेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?

स्वर्णज्वालेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में छठा शिवलिंग है। इसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के छठे अध्याय में मिलती है। पुराण के अनुसार शिव के तेज से जन्मे सोने को इसी लिंग के दर्शन से शुद्धि और दीप्ति मिली, और उसी दीप्ति से लिंग का नाम पड़ा।

पाठ का रूप "स्वर्णज्वालेश्वर" है। कई जगह स्वर्णजालेश्वर लिखा मिलता है, जो लोक में चलता रूप है, पुराण का नहीं।

स्थानीय विवरणों में यह मंदिर रामघाट की राम सीढ़ी पर, ढुण्ढेश्वर महादेव के ऊपर बताया जाता है।

संक्षेप में जानें

  • शिव का तेज अग्नि के मुख में गया और उससे "कांचन" यानी सोना जन्मा।
  • सोने के लोभ में पूरा जगत युद्ध में उतर पड़ा, और देवता ब्रह्मलोक की शरण में गए।
  • अग्नि की प्रार्थना पर शिव ने सोने को वरदान दिया और उसे महाकालवन के लिंग की ओर भेजा।
  • दर्शन से सोना ज्वालाओं से दीप्त हुआ, और शिव "स्वर्णज्वालेश्वर" कहलाए।

स्वर्णज्वालेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?

विषय जानकारी
नाम का आधार ज्वालाओं से दीप्त हुए सोने के कारण शिव का नाम
देवता शिव, लिंग रूप में
मूल ग्रंथ स्कन्दपुराण 5.2.6 (आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 6)
84 महादेव में क्रम छठा
कथा के पात्र शिव, पार्वती, अग्नि, कांचन (सोना), ब्रह्मा, बृहस्पति, इंद्र
पौराणिक स्थान महाकालवन, कर्कोटक के दक्षिण में
कथा के वक्ता शिव, जो पार्वती को सुनाते हैं
शिव खुद मानते हैं कि वचन लोभ में दिया

स्वर्णज्वालेश्वर के अध्याय में शिव अपनी बात पहले पुरुष में कहते हैं, और एक जगह कहते हैं कि अग्नि को वचन उन्होंने लोभवश दिया था (श्लोक 39)। सोने के जन्म की कथा में कर्ता, भोक्ता और स्वीकार करने वाले, तीनों शिव ही हैं।

स्कन्दपुराण में स्वर्णज्वालेश्वर महादेव की कथा क्या है?

अध्याय की शुरुआत शिव के इस वचन से होती है (स्कन्दपुराण 5.2.6.1):

स्वर्णज्वालेश्वरं षष्ठं विद्धि चात्र यशस्विनि ।
यस्य दर्शनमात्रेण धनवानिह जायते ॥

अर्थ: हे यशस्विनी (पार्वती), यहाँ छठे लिंग को स्वर्णज्वालेश्वर जानो, जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य यहीं, इस लोक में, धनवान हो जाता है। श्लोक 1 सिर्फ इसी फल की बात करता है। पाप-नाश और दूसरी इच्छाओं का फल आगे के श्लोकों में आता है।

सौ दिव्य वर्ष और अग्नि का भेजा जाना

शिव पार्वती से कहते हैं कि पूर्वकाल में उनके भवन में तुम्हारे साथ क्रीड़ा करते सौ दिव्य वर्ष बीत गए। तब सभी देवताओं ने तीनों लोकों के हित के लिए अग्नि को शिव के पास भेजा।

क्रीड़ा के बीच शिव का तेज (पाठ का शब्द "वीर्य") अग्नि के मुख में पड़ा। जलन से व्याकुल अग्नि गंगा के पास गए और उसे वहाँ छोड़ दिया, फिर भी शेष अंश से वे जलते रहे।

कांचन का जन्म

उसी शेष अंश से दिव्य, सुंदर "कांचन" यानी सोना उत्पन्न हुआ। वह इतने ताप से जल रहा था कि असह्य था। पाठ उसे अग्नि की पहली संतान कहता है।

सोने के लिए युद्ध

लोभ में असुर, सुर, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, साध्य, पिशाच, मनुष्य, राक्षस, पक्षी, भूत और वेताल, सब "मेरा है, मेरा है" कहते टूट पड़े। पिता-पुत्र, पति-पत्नी और माँ-बेटे तक एक-दूसरे को मारने लगे। पाठ कहता है कि सोने के कारण वैर बँध गया।

भीषण युद्ध में पृथ्वी काँपी, इंद्र समेत देवता भयभीत हुए और समुद्र क्षुब्ध हो गए।

ब्रह्मलोक की शरण

वालखिल्य आदि ऋषि और इंद्र आदि देवता बृहस्पति को आगे करके ब्रह्मलोक पहुँचे। उनके साथ घायल स्त्रियाँ भी थीं, जिन्होंने पूरा वृत्तांत सुनाया। ब्रह्मा विचार करके सबको शिव के पास ले आए।

शिव ने पूछा कि किसने उन्हें घायल किया और कौन-सा दुष्ट दानव है। उत्तर मिला: हम सब लोभ में, सोने के कारण नष्ट हुए हैं।

सोने पर फैसला

शिव ने कहा कि जिसके कारण लोग प्राण त्यागें, उसे ब्रह्मघातक कहते हैं। इसलिए अग्नि का यह पुत्र शबल, यानी चितकबरे और विकारयुक्त शरीर वाला होगा। उसके शरीर में धातुएँ होंगी और उसे छेदन, दहन और घर्षण जैसे अतुल दुख सहने होंगे।

अग्नि की प्रार्थना

अपने पुत्र के लिए डरे हुए अग्नि उसे लेकर शिव के पास आए और उन्हें प्रसन्न किया। उन्होंने कहा कि हे शंकर, यह आपका पुत्र है, इसकी रक्षा कीजिए। इसे अपने भंडार में रखिए। आपके प्रसन्न होने पर ही यह किसी को मिलेगा, और जिसे आप चाहें, उसे दीजिए।

शिव ने "तथा" कहा। फिर अग्नि के पुत्र को गोद में बिठाया, सिर चूमा और बार-बार गले लगाया।

महाकालवन का लिंग

शिव ने सोने से कहा कि प्रलय में भी अक्षय रहने वाले महाकालवन में एक लिंग है (स्कन्दपुराण 5.2.6.43):

अक्षयं प्रलये पुत्र महाकालवनं शुभम् ।
तत्रैव विद्यते लिंगं कर्कोटकस्य दक्षिणे ॥

अर्थ: हे पुत्र, प्रलय में भी अक्षय, शुभ महाकालवन में कर्कोटक के दक्षिण में एक लिंग है। वह महापापों को हरने वाला और दीप्ति देने वाला है, और उसके दर्शन मात्र से तुम कृतकृत्य हो जाओगे।

सोने को वरदान

शिव ने सोने से कहा कि तुम पवित्र होगे और अपवित्र के लिए दुर्लभ। तुम्हारी कृपा से अकुलीन कुलीन, मलिन निर्मल और कुरूप रूपवान होगा। तुम सब रत्नों के अधिपति और देवों व लोकों के प्रिय बनोगे।

नामकरण

लिंग के दर्शन से सोना दिव्य रूप वाला, ज्वालाओं की माला से घिरा और निर्मल हो गया। लिंग ने स्वयं कहा कि आज से तुम पृथ्वी पर "कांचन" नाम से प्रसिद्ध होगे और सदा मेरे समीप रहोगे। सोना करोड़ सूर्यों जैसी प्रभा वाला हो गया।

नाम का कारण पाठ में इस तरह आता है (स्कन्दपुराण 5.2.6.53):

दीप्तिर्लब्धा सुवर्णेन ज्वालामालाकुला तदा ।
अतो देवि सुविख्यातः स्वर्णज्वालेश्वरः शिवः ॥

अर्थ: तब सोने ने ज्वालाओं की माला से घिरी दीप्ति पाई। इसलिए, हे देवी, शिव "स्वर्णज्वालेश्वर" नाम से प्रसिद्ध हुए।

स्कन्दपुराण में स्वर्णज्वालेश्वर महादेव के दर्शन का क्या फल बताया गया है?

श्लोक 54 से 61 की फलश्रुति में ये फल गिनाए गए हैं:

  1. दर्शन से इसी लोक में धन मिलता है (श्लोक 1), और फलश्रुति में विजय, राज्य, ऐश्वर्य, दान की शक्ति और अनंत पुत्र-पौत्र की बात आती है।
  2. जाने या अनजाने में किया गया पाप भी दर्शन से धुल जाता है।
  3. पुराण के अनुसार यहाँ पूजन से गया में पिंडदान से दुगुना फल मिलता है।
  4. गायत्री-जप के बड़े फल की बात भी इसी फलश्रुति में आती है।
  5. इसकी पूजा से सब दानों का पुण्य मिलता है।
  6. जो चतुर्दशी को स्वर्णज्वालेश्वर की पूजा करते हैं, उनकी इच्छाएँ पूरी करती हुई लक्ष्मी उनकी सदा पूजा करती हैं।

चतुर्दशी वाला श्लोक 59 यह है:

पूजयंति चतुर्दश्यां स्वर्णज्वालेश्वरं तु ये ।
पूज्यंते ते सदा लक्ष्म्या पूरयंत्या मनोरथान् ॥

श्लोक 60 और 61 के अनुसार यह लिंग देवताओं और गणों से रक्षित है, माया से मोहित कोई इसे नहीं जानता, और यह शिव की कृपा से ही दिखता है।

स्वर्णज्वालेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें पुराण से मेल नहीं खातीं?

इस कथा के साथ कई बातें जुड़ गई हैं जो स्कन्दपुराण के पाठ में नहीं हैं, या जिनमें श्लोक का पाठ ही बिगड़ गया है।

प्रचलित बात स्कन्दपुराण में स्थिति
श्लोक 1 में "धवानिह जायते" है और उसका अर्थ सब इच्छाओं की पूर्ति और पाप-नाश है पाठ "धनवानिह जायते" है, और श्लोक 1 का अर्थ केवल इसी लोक में धनवान होना है पाठ की भूल
कथा तारकासुर के वध के लिए पुत्र न होने से शुरू होती है, और शिव कैलास पर हैं अध्याय में तारकासुर और कैलास का नाम नहीं है। शिव अपने भवन में सौ दिव्य वर्ष क्रीड़ा करते हैं कथा से अलग
अग्नि को इंद्र ने भेजा अग्नि को सभी देवताओं ने भेजा (श्लोक 3) कथा से अलग
सोने का नाम "स्वर्णज्वालेश्वर" पड़ा सोने का नाम "कांचन" है। "स्वर्णज्वालेश्वर" शिव का नाम है (श्लोक 50 और 53) कथा से अलग
पूजा की विशेष तिथि चतुर्थी है पाठ में तिथि चतुर्दशी है (श्लोक 59) तिथि की भूल
सावन और महाशिवरात्रि पर यहाँ विशेष पूजा होती है अध्याय में सावन या महाशिवरात्रि का उल्लेख नहीं परंपरा
यहाँ सोना दान करने से पाप मिटते हैं पाप-नाश दर्शन से जुड़ा है (श्लोक 44, 55)। सोने के दान की महिमा सामान्य रूप से कही गई है, इस मंदिर के लिए अलग नहीं आंशिक
सोने का छेदना, जलाना और घिसना उसकी शुद्धि की परख का रूपक है अध्याय यह संबंध नहीं जोड़ता। ये ब्रह्मघातक होने के दंड के रूप में आते हैं आधुनिक व्याख्या
यहाँ पूजा से रुके हुए शुभ कार्य पूरे होते हैं पाठ में रुके कार्यों का कथन नहीं लोक-मान्यता
मंदिर महाकालेश्वरउज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन। के पास है पाठ में आज के स्थान का संकेत नहीं। पुराण लिंग को कर्कोटक के दक्षिण में बताता है अपुष्ट
मंदिर की आयु और निर्माता की जानकारी पाठ में किसी मंदिर-भवन की तिथि या निर्माता नहीं अप्रमाणित
कर्कोटेश्वर आज हरसिद्धि परिसर में हैं, इसलिए दिशा का सटीक मेल नहीं कहा जा सकता

पुराण लिंग को "कर्कोटक के दक्षिण" में बताता है। 84 महादेव की सूची में कर्कोटेश्वर दसवें हैं और आज के विवरणों के अनुसार हरसिद्धि मंदिर के परिसर में हैं, जबकि स्वर्णज्वालेश्वर राम सीढ़ी पर बताए जाते हैं, जो हरसिद्धि क्षेत्र से रामघाट की ओर उतरती है। इसलिए पाठ की दिशा और आज के स्थान को हूबहू मिला हुआ बताना ठीक नहीं। बाईसवें कर्कटेश्वर एक अलग मंदिर हैं, और नाम के कारण दोनों में भ्रम हो जाता है।

स्वर्णज्वालेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?

पुराण में सोने को ब्रह्मघातक क्यों कहा गया?

स्कन्दपुराण के स्वर्णज्वालेश्वर अध्याय में शिव कहते हैं कि जिसके कारण लोग प्राण त्यागें, उसे ब्रह्मघातक कहा जाता है। सोने के लिए हुए युद्ध में असंख्य प्राण गए, इसलिए अग्नि के पुत्र सोने को यह दोष लगा। इसी दोष के फलस्वरूप उसका शरीर शबल और विकारयुक्त बताया गया है।

पुराण में सोने के दान की क्या महिमा बताई गई है?

वरदान के श्लोकों में शिव सोने से कहते हैं कि तुम्हारे दान से दान, व्रत, नियम, यज्ञ, उपवास, तीर्थ और पिंड जैसे सब कर्म पूर्ण होंगे। यह सोने के दान की सामान्य महिमा है। पाठ इसे इस मंदिर में किए दान से नहीं जोड़ता।

क्या स्वर्णज्वालेश्वर की चतुर्दशी पूजा शुक्ल या कृष्ण पक्ष में करनी है?

स्कन्दपुराण के श्लोक 59 में केवल "चतुर्दशी" कहा गया है। वह शुक्ल पक्ष की है या कृष्ण पक्ष की, यह पाठ से स्पष्ट नहीं होता। मंदिर में आज किस चतुर्दशी को पूजा की परंपरा चलती है, इसकी कोई पुष्ट जानकारी नहीं मिली।

स्वर्णज्वालेश्वर के दर्शन का समय क्या है?

स्वर्णज्वालेश्वर महादेव के दर्शन का कोई पुष्ट आधिकारिक समय उपलब्ध नहीं है। छोटे मंदिरों में समय पुजारी की सुविधा और ऋतु के अनुसार बदलता रहता है, इसलिए जाने से पहले किसी स्थानीय पुजारी से पूछ लें।

उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में स्वर्णज्वालेश्वर का क्या स्थान है?

चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के क्रम में अगस्त्येश्वर पहले, गुहेश्वर दूसरे, ढुण्ढेश्वर तीसरे, डमरुकेश्वर चौथे, अनादिकल्पेश्वर पाँचवें और स्वर्णज्वालेश्वर छठे लिंग हैं। उनके बाद सातवें त्रिविष्टेश्वर आते हैं, जिनका नाम तगारे अनुवाद की सूची में त्रिविष्टपेश्वर लिखा है।

आज की यात्रा में पौराणिक क्रम और पैदल मार्ग का क्रम एक नहीं होता। राम सीढ़ी के मंदिर, यानी तीसरे, चौथे और छठे लिंग, एक साथ किए जा सकते हैं, और महाकाल परिसर के मंदिर अलग।

पूरी सूची के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।

स्वर्णज्वालेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?

स्वर्णज्वालेश्वर का अध्याय इस बात पर खत्म होता है कि यह लिंग देवताओं और गणों से रक्षित है और शिव की कृपा से ही दिखता है। अगला अध्याय सातवें लिंग त्रिविष्टेश्वर का है।