अनादिकल्पेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?
अनादिकल्पेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में पाँचवाँ शिवलिंग है। इसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के पाँचवें अध्याय में मिलती है। पुराण इसे सृष्टि से पहले प्रकट, अनादि और नित्य लिंग कहता है, जिसका आदि या अंत ब्रह्मा और विष्णु भी नहीं देख सके।
पाठ का रूप "अनादिकल्पेश्वर" है। हिंदी में कई जगह अनादि कल्पेश्वर अलग-अलग भी लिखा मिलता है, और रोमन में Anadikalpeshwar या Anadi Kalpeshwar।
स्थानीय विवरणों में यह मंदिर महाकाल मंदिर परिसर के भीतर, जूना महाकाल मंदिर के पास बताया जाता है।
संक्षेप में जानें
- पुराण के अनुसार लिंग कल्प के आरंभ में खुद प्रकट हुआ, जब सृष्टि का कोई तत्त्व मौजूद नहीं था।
- सृष्टि के कारण को लेकर ब्रह्मा और केशव (विष्णु) में विवाद हुआ। दोनों ने "मैं बड़ा हूँ" कहा।
- आकाशवाणी ने कहा कि महाकालवन के कल्पेश्वर लिंग का आदि या अंत जो देख लेगा, वही स्वामी होगा।
- दोनों हारकर लौटे, लिंग की स्तुति की, और उसके बाएँ-दाएँ खड़े हो गए।
अनादिकल्पेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| नाम का आधार | हर कल्प में "अनादि" (आदिहीन) कहा जाने वाला देव |
| देवता | शिव, लिंग रूप में |
| मूल ग्रंथ | स्कन्दपुराण 5.2.5 (आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 5) |
| 84 महादेव में क्रम | पाँचवाँ |
| कथा के पात्र | ब्रह्मा, केशव (विष्णु), आकाशवाणी |
| पौराणिक स्थान | महाकालवन |
| कथा के वक्ता | शिव, जो पार्वती को सुनाते हैं |
अनादिकल्पेश्वर की कथा कई जगह "ब्रह्मा और शिव का विवाद" बताकर चलती है। स्कन्दपुराण के पाठ में विवाद ब्रह्मा और केशव के बीच है। शिव पार्वती को कथा सुना रहे हैं, और जिस लिंग का आदि-अंत खोजा जा रहा है वही उनका लिंग-रूप है।
स्कन्दपुराण में अनादिकल्पेश्वर महादेव की कथा क्या है?
अध्याय की शुरुआत में शिव पार्वती से कहते हैं कि अनादिकल्पेश्वर को पाँचवाँ देव जानो। भजनों में इन्हें सब पापों का नाश करने वाला, अनादि और नित्य कहा गया है।
जब कुछ भी नहीं था
पुराण के अनुसार यह लिंग कल्प के आरंभ में अपने आप प्रकट हुआ। तब न अग्नि थी, न सूर्य, न पृथ्वी, न दिशाएँ और आकाश, न वायु और जल, न स्वर्ग, चंद्रमा और ग्रह। देव, असुर, गंधर्व, पिशाच और राक्षस भी नहीं थे।
इसी लिंग से स्थावर-जंगम जगत निकला, और प्रलय में सब इसी में लय हो जाता है। देवों, ऋषियों और पितरों के वंश, मन्वंतर और राजाओं के कुल भी इसी से उत्पन्न बताए गए हैं।
नाम और विवाद
पुराण कहता है कि हर कल्प में यह देव "अनादि" कहलाता है, इसलिए वह अनादिकल्पेश्वर है।
कल्प के आरंभ में ब्रह्मा और केशव में विवाद हुआ। प्रश्न था कि सृष्टि का कारण कौन है, और दोनों कह रहे थे, "मैं बड़ा हूँ।"
आकाशवाणी की शर्त
तभी आकाश से एक अशरीरी दिव्य वाणी आई: महाकालवन में कल्पेश्वर नाम का एक लिंग है। जो उसका आदि या अंत देख लेगा, वही स्वामी बनेगा।
ब्रह्मा ऊपर, विष्णु नीचे
ब्रह्मा असीम ऊर्ध्वलोक की ओर गए। विष्णु नीचे के लोकों की ओर दौड़े। न ब्रह्मा को लिंग का अंत मिला, न विष्णु को उसका आदि।
स्तुति और नामकरण
खाली हाथ लौटकर दोनों ने एक-दूसरे की प्रशंसा की और लिंग के सामने आकर खड़े हो गए। फिर वेद की स्तुतियों से उन्होंने लिंग का गान किया और कहा कि आज से यह "अनादिकल्प" नाम से प्रसिद्ध होगा।
कथा के अंत में केशव और ब्रह्मा उस लिंग के बाएँ और दाएँ स्थित हो गए।
स्कन्दपुराण में अनादिकल्पेश्वर महादेव के दर्शन का क्या फल बताया गया है?
इस अध्याय की फलश्रुति शिव सीधे नहीं कहते। श्लोक 32 से 41 के समूह में ये बातें ब्रह्मा और विष्णु की स्तुति के शब्दों में आती हैं:
- पंच महापापों से दूषित, दुष्ट मन का व्यक्ति भी इस देव को देखकर शिव को पा सकता है।
- इस लिंग के दर्शन से उतना पुण्य मिलता है जितना सब तीर्थों के स्नान से, या उससे भी अधिक।
- पूजन करने पर वह पुण्य मिलता है जो अश्वमेध या राजसूय यज्ञ से मिलता है।
- जिन्होंने अनादिकल्पेश्वर को नहीं देखा, उन्हें स्तुति में संसार में पशु समान कहा गया है और उनका जन्म निरर्थक बताया गया है।
यज्ञ का फल पूजन से जुड़ा है, केवल दर्शन से नहीं। अध्याय में कोई तिथि, मास या वार तय नहीं है।
क्या अनादिकल्पेश्वर की कथा शिव पुराण की लिंगोद्भव कथा जैसी है?
ब्रह्मा और विष्णु के बीच लिंग का आदि-अंत खोजने की कथा शिव पुराण में भी है, इसलिए दोनों अक्सर मिला दी जाती हैं। शिव पुराण की रुद्र संहिता में यह "ब्रह्मा और विष्णु का विवाद" नाम के अध्याय में आती है। ये दोनों कथाएँ अलग हैं और इन्हें एक में मिलाना ठीक नहीं।
| बिंदु | स्कन्दपुराण 5.2.5 (अनादिकल्पेश्वर) | शिव पुराण (लिंगोद्भव) |
|---|---|---|
| विवाद का कारण | सृष्टि का कारण कौन है, "मैं बड़ा हूँ" | श्रेष्ठता की होड़, विद्येश्वर संहिता में अस्त्र-युद्ध तक |
| लिंग कैसे मिला | आकाशवाणी बताती है कि महाकालवन में "कल्पेश्वर" लिंग है | लिंग दोनों के बीच अग्नि-स्तंभ के रूप में प्रकट होता है |
| रूप | कोई हंस या वराह रूप नहीं बताया गया | ब्रह्मा हंस बनते हैं, विष्णु वराह |
| झूठ और केतकी | नहीं | ब्रह्मा का झूठ, केतकी झूठी गवाह |
| शाप | नहीं | ब्रह्मा और केतकी को शाप |
| अंत | दोनों स्तुति करते हैं और लिंग के बाएँ-दाएँ स्थित होते हैं | शिव प्रकट होकर दंड और क्षमा देते हैं |
| स्थान | महाकालवन (उज्जैन) | कोई विशिष्ट तीर्थ नहीं |
अनादिकल्पेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें पुराण से मेल नहीं खातीं?
इस कथा के साथ कुछ बातें ऐसी जुड़ गई हैं जो स्कन्दपुराण के पाठ में नहीं हैं, या जिनका कोई पक्का स्रोत नहीं मिलता।
| प्रचलित बात | स्कन्दपुराण में | स्थिति |
|---|---|---|
| विवाद ब्रह्मा और शिव के बीच था | विवाद ब्रह्मा और केशव के बीच है। शिव कथा के वक्ता हैं | पाठ से अलग |
| सृष्टि से पहले पितृ और ऋषि भी नहीं थे | पितृ और ऋषि अभाव-सूची में नहीं हैं। उनके वंश इसी लिंग से उत्पन्न बताए गए हैं। अभाव-सूची में राक्षस और स्वर्ग हैं | सूची में भूल |
| अश्वमेध और राजसूय का फल केवल दर्शन से मिलता है | यह फल "पूजन" से कहा गया है | आंशिक |
| फलश्रुति शिव ने स्वयं कही | ये शब्द ब्रह्मा और विष्णु की स्तुति के हैं | पाठ से अलग |
| मंदिर महाकाल परिसर के नैऋत्य (दक्षिण-पश्चिम) कोने में है | पाठ में मंदिर के स्थान का कोई संकेत नहीं | अपुष्ट |
| मंदिर परिसर लगभग 100 वर्ग फुट का है | पाठ में नाप का कोई उल्लेख नहीं | अप्रमाणित |
| 84 महादेव दूषण दैत्य के रक्त की 84 बूँदों से बने | अनादिकल्पेश्वर के अध्याय में ऐसा कोई प्रसंग नहीं | लोक-परंपरा |
| मंदिर की आयु और निर्माता की जानकारी | पाठ में किसी मंदिर-भवन की तिथि या निर्माता नहीं | अप्रमाणित |
लिंग का सिरा न पाकर ब्रह्मा और केशव एक-दूसरे की प्रशंसा करते हैं और वेद की स्तुतियों से लिंग का गान करते हैं। इस होड़ का अंत दोनों के लिंग के बाएँ-दाएँ खड़े होने पर होता है।
अनादिकल्पेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?
ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र का इस लिंग से क्या संबंध है?
स्कन्दपुराण के अनुसार अनादिकल्पेश्वर अव्यक्त और सूक्ष्म पुरुष है, जो गंध, रूप, रस, शब्द और स्पर्श से रहित है और तीनों गुणों का कारण है। वही ईश्वर रजोगुण से ब्रह्मा, सत्त्वगुण से विष्णु और तमोगुण से रुद्र बनता है। पुराण इसे किसान के बोने, रखवाली करने और काटने से समझाता है।
क्या अनादिकल्पेश्वर की कथा सुनने से भी फल मिलता है?
हाँ, अध्याय के अनुसार इस कथा को केवल सुनने से भी श्रेष्ठ लोक मिलता है। यह फल दर्शन और पूजन के फल से अलग गिना गया है। इस कथन में किसी विधि, दिन या संख्या का उल्लेख नहीं है।
क्या अनादिकल्पेश्वर के दर्शन का कोई खास दिन है?
स्कन्दपुराण के अनादिकल्पेश्वर अध्याय में दर्शन के लिए कोई खास तिथि, मास या वार नहीं बताया गया। 84 महादेव की यात्रा सावन और अधिकमास में निकलती है, और अनादिकल्पेश्वर उसका पाँचवाँ पड़ाव है। यह यात्रा-परंपरा है, पुराण का विधान नहीं।
अनादिकल्पेश्वर महादेव के दर्शन का अलग समय क्या है?
अनादिकल्पेश्वर उप-मंदिर के दर्शन का अलग पुष्ट समय उपलब्ध नहीं है। मंदिर महाकाल परिसर में बताया जाता है, इसलिए समय की सही जानकारी के लिए मंदिर समिति या परिसर के पुजारी से पूछ लें।
उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में अनादिकल्पेश्वर का क्या स्थान है?
चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के क्रम में अगस्त्येश्वर पहले, गुहेश्वर दूसरे, ढुण्ढेश्वर तीसरे, डमरुकेश्वर चौथे और अनादिकल्पेश्वर पाँचवें लिंग हैं। उनके बाद स्वर्णज्वालेश्वर छठे आते हैं। अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्य के अध्याय 70 की तीर्थ-सूची में भी यही क्रम है।
अनादिकल्पेश्वर का अध्याय सृष्टि के कारण और ईश्वर के स्वरूप पर टिका है, और उसमें तीन गुणों से ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र बनने का विवेचन भी आता है।
पूरी सूची के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।
अनादिकल्पेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?
अनादिकल्पेश्वर का अध्याय कथा सुनने के फल पर खत्म होता है। अगला अध्याय स्वर्णज्वालेश्वर का है, जो छठा लिंग है।
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