सिद्धेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?
सिद्धेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में ग्यारहवाँ शिवलिंग है, जिसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के 11वें अध्याय में मिलती है। तप से सिद्धि न पा सके योगी ब्राह्मणों को महाकालवन के इसी लिंग के दर्शन से परम सिद्धि मिली, और लिंग सिद्धेश्वर कहलाया।
नाम में दो शब्द हैं: सिद्ध और ईश्वर। पुराण नाम की व्याख्या कथा से ही करता है: जिन्होंने इस लिंग के दर्शन किए, उन्हें सिद्धियाँ मिलीं।
स्थानीय परंपरा इस लिंग को भैरवगढ़ में सिद्धनाथ (सिद्धवट) मंदिर के प्रवेश-द्वार के पास, सिद्धनाथ घाट की ओर बताती है।
संक्षेप में जानें
- ब्राह्मणों का तप निष्फल रहा, और उन्हें उस पर शंका होने लगी।
- उन्हें महाकालवन भेजने वाली शिव नहीं, एक अशरीरी वाणी थी।
- लिंग के दर्शन से उन्हें परम सिद्धि मिली।
- पाठ में सोमवार, अष्टमी, चतुर्दशी, संक्रान्ति और ग्रहण के दिन पूजा के लिए आते हैं।
सिद्धेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| नाम का अर्थ | सिद्धों के ईश्वर (शिव), सिद्धियाँ देने वाले |
| देवता | शिव, लिंग रूप में |
| मूल ग्रंथ | स्कन्दपुराण, आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 11 |
| 84 महादेव में क्रम | ग्यारहवाँ |
| वक्ता और श्रोता | ईश्वर (शिव) और देवी |
| कथा के स्थान | देवदारुवन (तप), महाकालवन (लिंग) |
नाम में "सिद्ध" साझा होने से दोनों जुड़े लगते हैं, पर सिद्धवट (भैरवगढ़ में क्षिप्रा तट का वटवृक्ष और शक्तिभेद तीर्थ) अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्य (स्कन्दपुराण 5.1) का तीर्थ है। सिद्धेश्वर का अध्याय 11 (5.2) न सिद्धवट का, न शिप्रा का, न भैरवगढ़ का उल्लेख करता है। लिंग का आज का स्थान परंपरा से पहचाना गया है।
स्कन्दपुराण में सिद्धेश्वर महादेव की कथा क्या है?
अध्याय में शिव देवी को संबोधित करके ग्यारहवें लिंग का नाम बताते हैं:
लिङ्गमेकादशं विद्धि देवि सिद्धेश्वरं शुभम् ।
वीरभद्रसमीपे तु सर्वसिद्धिप्रदायकम् ॥
अर्थ: हे देवि, शुभ सिद्धेश्वर लिंग को ग्यारहवाँ जानो। यह वीरभद्र के समीप है और सब सिद्धियाँ देने वाला है (स्कन्दपुराण 5.2.11.1)।
देवदारुवन के योगी ब्राह्मण
बहुत पहले देवदारुवन में कुछ ब्राह्मण योग का अभ्यास करते थे और आध्यात्मिक शक्तियाँ पाने के लिए एक-दूसरे से होड़ करते थे। उन्होंने हर कठिन तप और व्रत आज़माया। सैकड़ों वर्ष बाद भी उन्हें कोई बड़ी सिद्धि नहीं मिली।
शंका और तप से मुँह मोड़ना
ब्राह्मण सोचने लगे कि पुराने ऋषियों का यह वचन कि तप से सब मिलता है, झूठा निकला। उन्होंने मान लिया कि असली साधन कुछ और हैं: अञ्जन, (जादुई) गुटिका, पादुका पहनकर चलना, खड्ग-सिद्धि, गुफा-वास और पारस पत्थर।
उन्होंने तप छोड़ दिया और नास्तिक हो गए।
अशरीरी वाणी
तभी एक अशरीरी वाणी ने उन्हें ऐसे सांत्वना दी, जैसे माँ अपने पुत्र को देती है। वाणी ने बताया कि उनकी शक्ति किस कारण नष्ट हुई, और कहा कि महाकालवन जाओ और एकाग्र मन से देवों के स्वामी की आराधना करो, क्योंकि वे सिद्धियाँ देने वाले हैं और उनके दर्शन मात्र से उत्तम सिद्धि मिल जाती है।
लिंग का नामकरण
ब्राह्मण गए और उस लिंग के दर्शन किए, और उन्हें परम सिद्धि मिल गई। तभी से वह देव सिद्धेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुआ।
यहाँ किसे क्या मिला
अध्याय उसी लिंग से सिद्धि पाने वाले और लोगों के नाम भी गिनाता है:
- सनक आदि योगी ऋषियों को परम सिद्धि मिली।
- राजा वसुमान् को लिंग के दर्शन-मात्र से दुर्लभ खड्ग-सिद्धि मिली।
- हैहय को पादुका-गमन (सिद्ध पादुकाओं से गमन) मिला, और कृतवीर्य के उसी पुत्र को हज़ार वाहन (अश्व) मिले।
- अनूरु (अरुण) को अदृश्य होने की शक्ति मिली।
- अनेक दूसरे सिद्धों को स्वर्ण, पादलेप, रसायन और अञ्जन की सिद्धियाँ मिलीं।
स्कन्दपुराण सिद्धेश्वर महादेव की पूजा का क्या फल बताता है?
अध्याय की फलश्रुति में शिव अपने शब्दों में ये फल गिनाते हैं:
- जो लिंग के नियमित दर्शन करता है, उसे छह महीने में हृदय में चाही हुई सिद्धि मिलती है।
- जो अष्टमी और चतुर्दशी को, विशेषकर कृष्णपक्ष में, दर्शन करता है, वह शिव का भवन देखता है।
- पुत्रहीन को पुत्र, निर्धन को धन, विद्या चाहने वाले को विद्या और पत्नी चाहने वाले को पत्नी मिलती है।
- जो सूर्य की संक्रान्ति, ग्रहण या सोमवार को देव की पूजा करता है, वह अपने पितृकुल की सौ पीढ़ियों का उद्धार करता है, और चौदह इन्द्रों के काल तक शिव के लोक में आनन्द पाता है।
- प्रसंगवश, भावावेश में सिद्धेश्वर के पास जाने वाले भी अवश्य सिद्ध हो जाते हैं।
- महापाप से दूषित व्यक्ति भी सिद्धेश्वर का स्मरण करके निश्चय ही सिद्ध, ज्ञानी और समृद्ध हो जाता है।
क्या पाठ में जलाभिषेक या मोक्ष का उल्लेख है?
फलश्रुति दर्शन, गमन और स्मरण की बात करती है। उसमें जल से अभिषेक का उल्लेख नहीं है। वह शिव के भवन और शिव के लोक की बात करती है, मोक्ष की नहीं।
सिद्धेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें कथा से मेल नहीं खातीं?
सिद्धेश्वर महादेव की कथा कई जगह बदले हुए रूप में सुनाई जाती है। जो बातें स्कन्दपुराण के पाठ से मेल नहीं खातीं, वे यहाँ हैं।
| प्रचलित बात | स्कन्दपुराण की कथा में | स्थिति |
|---|---|---|
| आकाशवाणी ने कहा कि ग्यारहवाँ लिंग वीरभद्र के पास है | यह बात शिव श्लोक 1 में देवी से कहते हैं; वाणी केवल ब्राह्मणों को महाकालवन जाने को कहती है | कथा के विरुद्ध |
| आकाशवाणी महाकालवन से आई | वाणी का कोई स्थान नहीं बताया गया | कथा में नहीं |
| कथा दारुकावन की है और शिव भिक्षाटन करते हैं | वन देवदारुवन है, और अध्याय में भिक्षाटन का कोई प्रसंग नहीं है | कथा के विरुद्ध |
| राजा "वामुमन" को "खंड सिद्धि" मिली | राजा वसुमान् को खड्ग (तलवार) की सिद्धि मिली | कथा के विरुद्ध |
| कृतवीर्य को हज़ार घोड़े मिले | वे कृतवीर्य के पुत्र हैहय को मिले | कथा के विरुद्ध |
| कृष्णपक्ष की अष्टमी या चतुर्दशी को जलाभिषेक से शिवलोक मिलता है | इन तिथियों पर, विशेषकर कृष्णपक्ष में, दर्शन से शिव का भवन दिखता है; जल चढ़ाने का नाम नहीं है | अंशतः कथा में |
| लिंग "योग्य पुत्र" और "शुद्ध ज्ञान" देता है | लिंग पुत्र, धन, विद्या या पत्नी देता है; "योग्य" और "शुद्ध" शब्द पाठ में नहीं हैं | अंशतः कथा में |
| यह मंदिर सिद्धि और मोक्ष का केन्द्र है | पाठ सिद्धि और शिव के लोक की बात करता है; मोक्ष शब्द नहीं आता | बाद की व्याख्या |
84 महादेव की सूची में 59वें स्थान पर भी एक सिद्धेश्वर है, जो गोपाल मंदिर के पीछे की गली में बताया जाता है। देवदारुवन के ब्राह्मणों की अध्याय 11 वाली कथा केवल ग्यारहवें लिंग की है। 59वें की अपनी अलग कथा है, इसलिए दोनों को मिलाएँ नहीं।
सिद्धेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?
ब्राह्मणों ने कौन-कौन से तप आज़माए?
अध्याय देवदारुवन के ब्राह्मणों के कई तप गिनाता है। कुछ केवल साग-पात खाते थे, कुछ निराहार रहते थे, कुछ पत्ते खाते थे, और कुछ दाँतों या पत्थर से कूटकर अन्न खाते थे। कुछ वीरासन में बैठते थे, कुछ पैर ऊपर और मुख नीचे करके धुएँ पर लटकते थे, और कुछ खुले आकाश के नीचे रहते थे।
वाणी किन दोषों को कारण बताती है और किन गुणों की प्रशंसा करती है?
वाणी कहती है कि तप की शक्ति काम, अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह से नष्ट होती है, और होड़ करके सिद्धि चाहने वालों को दोषी ठहराती है। वह उसकी प्रशंसा करती है जो एकाग्र रहकर कर्तव्य करे, ईश्वर और श्रुति में आस्था रखे, और पराई स्त्री को माता तथा पराए धन को ढेले जैसा माने।
पादलेप, अञ्जन और रसायन क्या हैं?
Tagare के अनुवाद में पादलेप का अर्थ पैरों पर लेप लगाना है, अञ्जन छिपे खज़ाने दिखाने वाला जादुई काजल है, और रसायन अमर करने वाला रसायन है। अध्याय के अनुसार स्वर्ण-सिद्धि के साथ ये चारों सिद्धियाँ अनेक सिद्धों को सिद्धेश्वर के दर्शन से मिलीं। संदेह में पड़े ब्राह्मण इन्हीं साधनों के पीछे भागे थे।
क्या आज का मंदिर वही जगह है जिसका पुराण में वर्णन है?
सिद्धेश्वर महादेव के आज के मंदिर की पहचान परंपरा पर टिकी है। पुराण लिंग को केवल "वीरभद्र के समीप" बताता है, और यह नहीं कहता कि वीरभद्र कोई मंदिर, प्रतिमा या शिव-गण का स्थान है। परंपरा इसे सिद्धनाथ के प्रवेश-द्वार पर बताती है, इसलिए पाठ से मिलान श्रद्धा का विषय है।
उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में सिद्धेश्वर ग्यारहवें क्यों हैं?
आवन्त्यखण्ड में अध्याय 10 कर्कोटेश्वर का और अध्याय 12 लोकपालेश्वर का है, और सिद्धेश्वर का अध्याय 11 श्रोता को लोकपालेश्वर की कथा सुनने के निमंत्रण पर खत्म होता है। आज की 84 महादेव सूचियाँ भी सिद्धेश्वर को ग्यारहवें स्थान पर रखती हैं।
स्कन्दपुराण में 84 नामों की एक अलग सूची भी है, जिसका क्रम भिन्न है। यात्रा में अध्याय का क्रम माना जाता है। पूरी सूची के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।
सिद्धेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?
अगला लिंग लोकपालेश्वर है, जो बारहवाँ है, और अध्याय उसी की कथा सुनने के निमंत्रण पर खत्म होता है। ठीक पहले दसवें स्थान पर कर्कोटेश्वर हैं।
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