डमरुकेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?

डमरुकेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में चौथा शिवलिंग है। इसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के चौथे अध्याय में मिलती है। पुराण के अनुसार शिव के डमरू की ध्वनि से यह लिंग धरती भेदकर प्रकट हुआ, और उसी से इसका नाम पड़ा।

पाठ का रूप "डमरुकेश्वर" है। हिंदी में डमरूकेश्वर लिखा जाता है और रोमन में Damarukeshwar या Damrukeshwar।

स्थानीय विवरणों में यह मंदिर हरसिद्धि मार्ग पर राम सीढ़ी के ऊपर बताया जाता है।

संक्षेप में जानें

  • रुरु असुर के पुत्र वज्र ने देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया और यज्ञ, वेदपाठ बंद करा दिए।
  • तेज-पुंज से प्रकट कृत्या और उसकी हँसी से निकली कन्याएँ वज्र से लड़ीं, पर उसकी तामसी माया ने उन्हें मूर्छित कर दिया।
  • नारद की सूचना पर शिव भयंकर रूप में लौटे और डमरू बजाया।
  • ध्वनि से उठे लिंग की ज्वाला और वायु ने पूरी असुर सेना जला दी।

डमरुकेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?

विषय जानकारी
नाम का आधार डमरू (शिव का हाथ का ढोल) की ध्वनि से प्रकट होना
देवता शिव, लिंग रूप में
मूल ग्रंथ स्कन्दपुराण 5.2.4 (आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 4)
84 महादेव में क्रम चौथा
कथा के पात्र शिव, असुर वज्र, उसके पिता रुरु, कृत्या, नारद, ब्रह्मा
पौराणिक स्थान महाकालवन
कथा के वक्ता शिव, जो पार्वती को सुनाते हैं
कथा शिव खुद सुनाते हैं, "मैंने" कहकर

पूरा चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य शिव देवी को सुनाते हैं, इसलिए डमरुकेश्वर के अध्याय में भी वे अपने काम पहले पुरुष में बताते हैं: "मैंने भयंकर डमरू बजाया।" लिंग के प्रकट होने का ब्योरा खुद शिव देते हैं।

स्कन्दपुराण में डमरुकेश्वर महादेव की कथा क्या है?

अध्याय के पहले ही श्लोक में शिव कहते हैं कि अवन्ती में यह चौथे देवता डमरुकेश्वर प्रसिद्ध हैं, और इनके दर्शन से पाप नष्ट होते हैं। फिर वे बताते हैं कि यह लिंग कैसे प्रकट हुआ।

रुरु का पुत्र वज्र

पूर्वकाल में, वैवस्वत कल्प में, रुरु नाम का एक महान असुर था। उसका पुत्र वज्र बलवान, विशालकाय और तीखी दाढ़ों वाला था। उसने देवताओं को उनके पदों और स्वर्ग से निकाल दिया और उनका सारा धन छीन लिया।

ब्रह्मा भी भागे

देवता ब्रह्मा के पास गए। पुराण के अनुसार ब्रह्मा भी डर गए, और वज्र को अजेय जानकर देवताओं समेत वहाँ से भाग निकले।

इसके बाद वज्र ने यज्ञ और तप करने वाले ब्राह्मणों और दूसरे धर्मात्माओं को मार डाला। पृथ्वी पर वेदपाठ और "वषट्" का उच्चारण बंद हो गया, यज्ञ-उत्सव रुक गए और चारों ओर "हा! हा!" की पुकार उठने लगी।

कृत्या का प्रकट होना

दुखी देवता और महर्षि असुर के वध का उपाय सोच ही रहे थे कि उनके सामने तेज-पुंज से घिरा एक विशाल शरीर प्रकट हुआ। उससे कमल जैसे नेत्रों वाली दिव्य कृत्या उठी और बोली, "मुझे क्यों उत्पन्न किया गया?"

देवताओं ने वज्र के कुकर्म गिनाए। तब वह बार-बार ज़ोर से हँसी, और उसकी हँसी से कमल-नयनी कन्याएँ निकलती गईं। उनके रूप भयानक थे, मुख ज्वालाओं से ढके थे और हाथों में पाश और अंकुश थे। उन्होंने वज्र की सेना से घोर युद्ध किया।

तामसी माया और महाकालवन की शरण

इन कन्याओं को पुराण मातृगण कहता है। उनके सामने असुर सेना पीछे हटने लगी। तब वज्र ने "तामसी" नाम की माया रची। कन्याएँ मूर्छित होने लगीं और चारों ओर घना अंधकार छा गया।

कृत्या देवी डरकर उन कन्याओं के साथ उत्तम महाकालवन पहुँचीं, जहाँ कपालधारी हर लिंग रूप में विराजमान थे। वज्र भी करोड़ों रथों वाली सेना लेकर महाकालवन में घुस आया।

नारद की सूचना

उसी समय नारद मन्दराचल पर शिव के पास पहुँचे और बोले (स्कन्दपुराण 5.2.4.25):

महाकालवने देव ताडितास्त्त्रिदशाः प्रभो ।
वज्रेण रुरुपुत्रेण तस्माद्याहि महेश्वर ॥

अर्थ: हे देव, महाकालवन में रुरु-पुत्र वज्र ने देवताओं को मारा है। इसलिए, हे महेश्वर, चलिए।

भयंकर रूप और डमरू का नाद

शिव भयंकर रूप धारण करके, सर्पों से सजे और गणों से घिरे महाकालवन लौटे। पहुँचते ही उन्होंने भयंकर डमरू बजाया, और उसकी ध्वनि से वज्र की सेना मोहित हो गई।

उसी नाद से धरती को भेदकर ज्वालाओं से घिरा एक उत्तम लिंग ऊपर उठा। लिंग के एक ओर से पूरे ब्रह्माण्ड में फैलती महाज्वाला निकली और दूसरी ओर से प्रचंड वायु चली। चक्कर काटती हवा ने ज्वालाओं को और भड़का दिया, और असुर सेना जलकर राख हो गई।

नामकरण

रुरु-पुत्र के मारे जाने पर देवता प्रसन्न हुए। अध्याय के अनुसार यह देव डमरू के शब्द से पृथ्वी पर उत्पन्न हुए, इसलिए "डमरुकेश्वर" नाम से प्रसिद्ध होंगे और सब कामनाएँ पूरी करेंगे।

स्कन्दपुराण में डमरुकेश्वर महादेव के दर्शन का क्या फल बताया गया है?

डमरुकेश्वर अध्याय की फलश्रुति में ये फल गिनाए गए हैं:

  1. दर्शन से पाप नष्ट होते हैं (श्लोक 1)।
  2. दर्शन और पूजन करने वाले दुख और ज्वर जैसे रोगों से मुक्त होते हैं।
  3. पूजन से उतना पुण्य मिलता है जितना सैकड़ों चान्द्रायण व्रत विधि से करने पर।
  4. दर्शन से हज़ार अश्वमेध, सौ वाजपेय और हज़ार गोदान का फल मिलता है।
  5. दर्शन करके युद्ध में जाने वाला वीर शत्रुओं पर जीत पाता है और अंत में रुद्रलोक में सम्मान पाता है।

श्लोक 39 और 40 में रुद्रलोक की बात इस तरह आती है (स्कन्दपुराण 5.2.4.39 और 40):

अस्मिन्स्थाने स्थितं लिंगं भक्त्या डमरुकेश्वरम् ।
प्रसंगादपि पश्यंति ह्यपि पापपरा नराः ॥
तेऽप्यवश्यं तु यास्यंति रुद्रलोकं सनातनम् ।
भक्ताः स्तोष्यंति ये लिंगं ख्यातं डमरुकेश्वरम् ॥

अर्थ: इस स्थान पर स्थित डमरुकेश्वर लिंग को पापी मनुष्य भी अगर संयोग से देख लें, तो वे भी अवश्य सनातन रुद्रलोक जाएँगे। यही बात उन भक्तों पर लागू है जो इस प्रसिद्ध लिंग की स्तुति करेंगे।

अध्याय में कोई तिथि, मास या वार नहीं बताया गया। फल दर्शन और पूजा से जुड़े हैं।

डमरुकेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें पुराण से मेल नहीं खातीं?

डमरुकेश्वर की कथा के साथ कुछ बातें जुड़ गई हैं जो स्कन्दपुराण के पाठ में नहीं हैं, या जिनमें नाम गलत चल रहे हैं।

प्रचलित बात स्कन्दपुराण में स्थिति
असुर का नाम "रुद्र" था असुर रुरु है और उसका पुत्र वज्र। संस्कृत श्लोक में "रुरुपुत्रेण" आता है नाम की गलती
शिव "उत्तम भैरव" रूप में आए शिव "भयंकर रूप" में आए। "उत्तम" शब्द लिंग के लिए आता है ("उत्तम लिंग") कथा से अलग
देवता और ऋषि पहले महाकालवन में इकट्ठा हुए देवता पहले ब्रह्मा के पास गए। महाकालवन बाद में शरण बना, जब कृत्या देवी कन्याओं सहित वहाँ आईं क्रम उलटा
कन्या मंत्र-साधना से प्रकट हुई कृत्या तेज-पुंज से उठती है। "मंत्र" केवल अनुवाद का वैकल्पिक अर्थ है आंशिक
रोहिणी नक्षत्र में घी मिली खीर का दान करना चाहिए अध्याय में नक्षत्र या दान का उल्लेख नहीं ज्योतिषीय व्याख्या
सावन और महाशिवरात्रि पर यहाँ विशेष पूजा होती है अध्याय में कोई तिथि या पर्व नहीं। सावन से 84 महादेव यात्रा का संबंध यात्रा-परंपरा का है परंपरा
मंदिर सैकड़ों साल पुराना है और काले पत्थर का बना है पाठ में मंदिर-भवन की कोई तिथि या बनावट नहीं अप्रमाणित
इस अध्याय में डमरू घटना का कारण है

डमरुकेश्वर के अध्याय में डमरू का काम सीधा है: उसकी ध्वनि असुर सेना को मोहित करती है और उसी नाद से लिंग धरती फोड़कर निकलता है। नाद-ब्रह्म या माहेश्वर सूत्रों से डमरू को जोड़ने वाली व्याख्याएँ शैव परंपरा में अलग से मिलती हैं, पर इस अध्याय में उनका ज़िक्र नहीं है।

डमरुकेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?

कृत्या कौन है और उसकी कन्याएँ कौन थीं?

डमरुकेश्वर अध्याय में कृत्या एक दिव्य शक्ति है जो देवताओं के सामने तेज-पुंज वाले विशाल शरीर से उठती है। उसकी हँसी से निकली कमल-नयनी कन्याओं को पुराण "मातृगण" कहता है। वे पाश और अंकुश लिए वज्र की सेना से लड़ती हैं, पर तामसी माया से मूर्छित हो जाती हैं।

क्या डमरुकेश्वर के दर्शन से युद्ध या मुकाबले में जीत मिलती है?

स्कन्दपुराण की फलश्रुति कहती है कि डमरुकेश्वर के दर्शन करके युद्ध में जाने वाला वीर शत्रुओं को हराता है। यह पुराण में कहा गया फल है। आज के किसी मुकाबले या मुकदमे में इसकी कोई गारंटी नहीं। अध्याय में इस फल के लिए कोई अलग विधि या दिन तय नहीं है।

क्या डमरुकेश्वर के दर्शन का कोई खास दिन है?

स्कन्दपुराण के डमरुकेश्वर अध्याय में दर्शन के लिए कोई खास तिथि, मास या वार नहीं बताया गया। 84 महादेव की यात्रा सावन और अधिकमास में निकलती है, और डमरुकेश्वर उसका चौथा पड़ाव है। यह यात्रा-परंपरा है, पुराण का विधान नहीं।

डमरुकेश्वर महादेव के दर्शन का समय क्या है?

डमरुकेश्वर महादेव के दर्शन का कोई पुष्ट आधिकारिक समय उपलब्ध नहीं है। छोटे मंदिरों में समय पुजारी की सुविधा और ऋतु के अनुसार बदलता रहता है, इसलिए जाने से पहले किसी स्थानीय पुजारी से पूछ लें।

उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में डमरुकेश्वर का क्या स्थान है?

चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के क्रम में अगस्त्येश्वर पहले, गुहेश्वर दूसरे, ढुण्ढेश्वर तीसरे और डमरुकेश्वर चौथे लिंग हैं। उनके बाद अनादिकल्पेश्वर पाँचवें और स्वर्णज्वालेश्वर छठे आते हैं। अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्य के अध्याय 70 की तीर्थ-सूची में भी यही क्रम है।

इस खंड के अंग्रेज़ी अनुवादक जी. वी. टगारे की भूमिका के अनुसार यह भाग महाकालवन क्षेत्र के उन 84 मंदिरों के बारे में है जो पुराण के रचनाकाल में थे। भूमिका यह भी मानती है कि लेखक किसी पौराणिक कथा को अपने प्रयोजन के अनुसार ढालता है या पौराणिक नामों के साथ नई कथा जोड़ देता है। इसलिए डमरुकेश्वर की कथा को पौराणिक परंपरा के रूप में पढ़ना ठीक है, ऐतिहासिक घटना के रूप में नहीं।

पूरी सूची के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।

डमरुकेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?

डमरुकेश्वर का अध्याय रुद्रलोक के फल पर खत्म होता है। अगला अध्याय अनादिकल्पेश्वर का है, जो पाँचवाँ लिंग है।