स्वर्गद्वारेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?

स्वर्गद्वारेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में नौवाँ शिवलिंग है। इसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के नौवें अध्याय में मिलती है। पुराण के अनुसार इसकी पूजा से स्वर्ग का बंद द्वार खुला, और अध्याय का आरंभिक श्लोक इसे पाप हरने वाला तथा स्वर्ग और मोक्ष का फल देने वाला कहता है।

पाठ का रूप "स्वर्गद्वारेश्वर" है। कुछ स्थानीय सूचियों में इसे स्वर्णद्वारपालेश्वर भी लिखा मिलता है। रोमन में Svargadvareshwar, Svargadvareshvara या Swargdwareshwar लिखा जाता है।

स्थानीय विवरणों में यह मंदिर नलियाबाखल क्षेत्र में, खंडार मोहल्ले के पीछे बताया जाता है।

संक्षेप में जानें

  • पार्वती को दक्ष के यज्ञ का न्योता नहीं मिला, और बहनों की बात सुनकर उन्होंने योगबल से प्राण त्याग दिए।
  • शिव के भेजे गणों ने यज्ञ उजाड़ा, और वीरभद्र ने देवताओं का सामना किया।
  • शिव ने स्वर्ग के द्वार पर एक गण बिठाया, जो किसी भी देवता को भीतर नहीं आने देता था।
  • ब्रह्मा की सलाह पर देवताओं ने महाकालवन में इस लिंग की पूजा की, तब द्वार खुला।

स्वर्गद्वारेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?

विषय जानकारी
नाम का आधार स्वर्ग का द्वार खुलने के बाद शिव का यह नाम पड़ा
देवता शिव, लिंग रूप में
मूल ग्रंथ स्कन्दपुराण 5.2.9 (आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 9)
84 महादेव में क्रम नौवाँ (अध्याय-क्रम के अनुसार)
कथा के पात्र शिव, पार्वती, दक्ष, अश्विनी आदि बहनें, वीरभद्र, इंद्र, विष्णु, ब्रह्मा
पौराणिक स्थान महाकालवन, कपालेश्वर के पूर्व में
कथा के वक्ता शिव (श्रीरुद्र), जो पार्वती को सुनाते हैं
सती का अग्निप्रवेश इस अध्याय की कथा में नहीं है

दक्ष-यज्ञ की लोकप्रिय कथा में सती अग्निकुंड में कूद जाती हैं। स्वर्गद्वारेश्वर के अध्याय में पार्वती योगबल से प्राण छोड़ती हैं। तगारे अनुवाद की भूमिका बताती है कि 84 लिंगों के माहात्म्य का लेखक प्रसिद्ध पुराण-कथाओं को अपने उद्देश्य के अनुसार बदल लेता है, इसलिए यहाँ शिवपुराण या भागवत की दक्ष-कथा भरना ठीक नहीं।

स्कन्दपुराण में स्वर्गद्वारेश्वर महादेव की कथा क्या है?

शिव पार्वती को यह कथा सुनाते हैं। अध्याय का आरंभ आठवें के बाद नौवें देव के नाम से होता है: स्वर्गद्वारेश्वर को पाप हरने वाला और स्वर्ग तथा मोक्ष का फल देने वाला जानो।

दक्ष का यज्ञ और बहनों की खबर

दक्ष ने यज्ञ किया, पर पार्वती को नहीं बुलाया। कैलास पर पार्वती की बहनें, अश्विनी आदि, आईं और यज्ञ के न्योते की बात बताई, जिससे पार्वती चकित हुईं।

इस प्रसंग का एक श्लोक संस्कृत पृष्ठ पर मिलता है (स्कन्दपुराण 5.2.9.7):

तच्छ्रुत्वा दारुणं वाक्यं दक्षो नोवाच किंचन ॥

अर्थ: वह कठोर वचन सुनकर दक्ष ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया।

पार्वती का प्राण त्याग

बहनों की बात सुनकर पार्वती ने योगबल से अपने प्राण त्याग दिए। शिव ने इसके बाद अपने गणों को यज्ञ नष्ट करने भेजा।

वीरभद्र और देवताओं का युद्ध

गणों में वीरभद्र देवताओं से भिड़ा। उसने इंद्र की छाती पर बर्छी मारी और ऐरावत पर प्रहार किया, और विष्णु का सुदर्शन चक्र निगल लिया। विष्णु ने गदा से उसे मारा, पर शिव के वरदान से वह बच गया।

इंद्र बेहोश हो गए। जब शिव त्रिशूल लिए स्वयं प्रकट हुए, तो इंद्र देवताओं के साथ भाग खड़े हुए। देवताओं की हार पर विष्णु क्रोधित होकर सुदर्शन से टूट पड़े, पर शिव को त्रिशूल लिए देख पीछे हट गए।

स्वर्ग के द्वार पर पहरा

इसके बाद शिव ने स्वर्ग के प्रवेश-द्वार पर एक गण बिठाया और आदेश दिया कि किसी देवता को भीतर न आने दे, जो घुसे उसे मार डाले। देवता स्वर्ग से बाहर हो गए।

ब्रह्मा की सलाह

देवता ब्रह्मलोक पहुँचे। ब्रह्मा ने कहा कि महादेव को प्रसन्न करो, और महाकालवन जाओ, जहाँ कपालेश्वर के पूर्व में स्वर्गद्वार लिंग है।

पूजन, द्वार का खुलना और नाम

देवताओं ने उस लिंग की पूजा की, और स्वर्ग का द्वार खुल गया। तब शिव स्वर्गद्वारेश्वर नाम से प्रसिद्ध हुए, स्वर्ग देने वाले के रूप में।

स्कन्दपुराण में स्वर्गद्वारेश्वर महादेव के दर्शन का क्या फल बताया गया है?

अध्याय की फलश्रुति में ये फल गिनाए गए हैं:

  1. अष्टमी या चतुर्दशी को, और सोमवार को दर्शन करना विशेष पुण्य देता है।
  2. पूजा का फल हज़ार अश्वमेध यज्ञों से बढ़कर कहा गया है।
  3. इस लिंग की आराधना दस हज़ार करोड़ लिंगों की पूजा के बराबर बताई गई है।
  4. जो रोज़ दर्शन करता है, वह स्वर्ग जाता है और अनेक जन्मों के पाप नष्ट होते हैं।
  5. संयोग से भी दर्शन करने वाले को किसी बात का भय नहीं रहता।

अष्टमी और चतुर्दशी के साथ पक्ष, यानी शुक्ल या कृष्ण, पाठ के पढ़े गए अंश में नहीं बताया गया।

स्वर्गद्वारेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें पुराण से मेल नहीं खातीं?

इस कथा के ऑनलाइन पुनर्कथनों में कई विवरण पाठ से अलग हैं।

प्रचलित बात स्कन्दपुराण में स्थिति
सती अग्निकुंड में कूद गईं पार्वती ने योगबल से प्राण त्यागे कथा से अलग
विष्णु के सुदर्शन से गण मारे गए, और वीरभद्र पर गदा बेअसर रही वीरभद्र ने सुदर्शन निगल लिया। विष्णु ने गदा मारी, पर वह शिव के वरदान से बच गया कथा से अलग
शिव के दर्शन मात्र से गण स्वर्ग-द्वार से हट गए देवताओं ने महाकालवन के लिंग की पूजा की, तब द्वार खुला कथा से अलग
एकादशी को दर्शन का विशेष फल पाठ में अष्टमी, चतुर्दशी और सोमवार हैं, एकादशी नहीं अपुष्ट
स्वर्णद्वारपालेश्वर शास्त्रीय नाम है पुराण का नाम स्वर्गद्वारेश्वर है। दूसरा रूप केवल कुछ स्थानीय सूचियों में मिलता है स्थानीय रूप
मंदिर की आयु और निर्माता की जानकारी पाठ में किसी मंदिर-भवन की तिथि या निर्माता नहीं अप्रमाणित
मंदिर का जीर्णोद्धार सिंहस्थ से पहले हो रहा है इस मंदिर के लिए अलग घोषणा नहीं मिली, केवल 84 महादेव के सामान्य जीर्णोद्धार की रिपोर्टें अपुष्ट
इसी नाम का एक स्वर्गद्वारेश्वर काशी में भी है

स्कन्दपुराण के काशी खण्ड (अध्याय 94) में भी "स्वर्गद्वारेश्वर" का उल्लेख है। तगारे की पादटिप्पणी के अनुसार वह वाराणसी में ब्रह्मनाल गली के पास है और उज्जैन वाले लिंग से अलग है। छठे लिंग स्वर्णज्वालेश्वर से भी इसे न मिलाएँ, जो एक अलग मंदिर है।

स्वर्गद्वारेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?

स्वर्णद्वारपालेश्वर और स्वर्गद्वारेश्वर में क्या अंतर है?

स्कन्दपुराण की अनुक्रमणिका और तीर्थ-सूची में नौवें लिंग का नाम स्वर्गद्वारेश्वर है। स्वर्णद्वारपालेश्वर केवल कुछ स्थानीय सूचियों में मिलता है, और उसके उद्गम का कोई प्रामाणिक स्रोत नहीं मिला। संभव है कि यह स्वर्ग और स्वर्ण की ध्वनि-समानता से बना हो, पर यह अनुमान है, तथ्य नहीं।

स्वर्गद्वारेश्वर को 9वाँ क्यों कहा जाता है, जबकि एक सूची में वह 11वाँ है?

चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य (5.2) के अध्याय-क्रम में स्वर्गद्वारेश्वर नौवें हैं, और यात्रा का प्रचलित क्रम इसी पर चलता है। अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्य के अध्याय 70 की तीर्थ-सूची में कर्कोटकेश्वर और सिद्धेश्वर के बाद वे ग्यारहवें दिखते हैं। इसलिए "9वाँ" अध्याय-क्रम है, सूची-क्रम नहीं।

क्या पुराण में स्वर्गद्वार को स्थल-संकेत की तरह भी इस्तेमाल किया गया है?

हाँ। स्कन्दपुराण 5.2.75 (वडलेश्वर) में मणिभद्र अपने पुत्र को उस स्थान पर ले जाते हैं जहाँ देवताओं के स्वामी "स्वर्गद्वार के दक्षिण" में थे। इसका अर्थ है कि पाठ में स्वर्गद्वार एक स्थल-चिह्न है। पर इससे आज के मंदिर का स्थान सिद्ध नहीं होता।

क्या आज का मंदिर कपालेश्वर के पूर्व में है?

पुराण लिंग को कपालेश्वर के पूर्व में बताता है। स्थानीय विवरणों में कपालेश्वर बिलोटीपुरा या अनंत पेठ की ओर और स्वर्गद्वारेश्वर नलियाबाखल क्षेत्र में बताए जाते हैं। दोनों बिंदुओं की आपसी दिशा किसी नक्शे या प्रामाणिक स्रोत से सत्यापित नहीं हुई, इसलिए सटीक मिलान का दावा नहीं किया जा सकता।

स्वर्गद्वारेश्वर के दर्शन का समय क्या है?

स्वर्गद्वारेश्वर महादेव के दर्शन का कोई पुष्ट आधिकारिक समय उपलब्ध नहीं है। समय की सही जानकारी के लिए जाने से पहले किसी स्थानीय पुजारी से पूछ लें।

उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में स्वर्गद्वारेश्वर का क्या स्थान है?

चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के क्रम में अगस्त्येश्वर पहले, गुहेश्वर दूसरे, ढुण्ढेश्वर तीसरे, डमरुकेश्वर चौथे, अनादिकल्पेश्वर पाँचवें, स्वर्णज्वालेश्वर छठे, त्रिविष्टपेश्वर सातवें, कपालेश्वर आठवें और स्वर्गद्वारेश्वर नौवें लिंग हैं। उनके बाद दसवें कर्कोटेश्वर हैं, जो स्थानीय विवरणों में हरसिद्धि मंदिर के परिसर में बताए जाते हैं।

कपालेश्वर के अध्याय का अंतिम वाक्य "अब स्वर्गद्वारेश्वर की कथा सुनो" है, और उसी से यह अध्याय जुड़ता है। यात्रा का भौगोलिक क्रम अध्याय-क्रम से अलग चलता है। एक पुरानी यात्रा-सूची में यह 39वें पड़ाव पर आता है, महाकाल क्षेत्र के लिंगों के ठीक बाद।

पूरी सूची के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।

स्वर्गद्वारेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?

अगला अध्याय दसवें लिंग कर्कोटेश्वर का है। तगारे के अनुसार चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य उन 84 मंदिरों का वर्णन करता है जो पुराण के समय महाकालवन क्षेत्र में थे। इससे परंपरा की प्राचीनता का संकेत मिलता है, आज की किसी इमारत की आयु का नहीं।