कर्कोटेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?
कर्कोटेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में दसवाँ शिवलिंग है, जिसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के दसवें अध्याय में मिलती है। मान्यता है कि नागराज कर्कोटक ने श्राप से बचने के लिए यहीं शिव की स्तुति की, और लिंग को उन्हीं का नाम मिला।
नाम में दो शब्द हैं: कर्कोटक और ईश्वर। पुराण के अध्याय का शीर्षक कर्कोटेश्वर और कर्कोटकेश्वर, दोनों रूप देता है, और बोलचाल में कर्कोटेश्वर चलता है।
यह लिंग हरसिद्धि मंदिर के प्रांगण में स्थित है।
संक्षेप में जानें
- कथा की शुरुआत वचन तोड़ने वाले सर्पों को मिले श्राप से होती है।
- उपाय ब्रह्मा बताते हैं, और ठिकाना है महाकालवन।
- कर्कोटक अपनी इच्छा से लिंग के सामने जाकर शिव की स्तुति करता है।
- शिव का वरदान केवल धर्म का आचरण करने वाले नागों के लिए है।
कर्कोटेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?
| विषय | जानकारी |
|---|---|
| नाम का अर्थ | कर्कोटक के ईश्वर (शिव) |
| देवता | शिव, लिंग रूप में |
| मूल ग्रंथ | स्कन्दपुराण, आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 10 |
| 84 महादेव में क्रम | दसवाँ |
| कथा के नाग | कर्कोटक, नागराज |
| पौराणिक क्षेत्र | महाकालवन |
नाग से जुड़े नाम की वजह से दोनों अक्सर गडमड हो जाते हैं। नागचंद्रेश्वर महाकाल मंदिर के ऊपरी तल पर स्थित नागपंचमी का मंदिर है, जो साल में एक दिन खुलता है। कर्कोटेश्वर दसवें महादेव हैं, और नागपंचमी से इनका कोई पाठ-आधारित संबंध नहीं बताया जाता।
स्कन्दपुराण में कर्कोटेश्वर महादेव की कथा क्या है?
अध्याय में शिव पार्वती को संबोधित करके दसवें लिंग का नाम कर्कोटेश्वर बताते हैं। आगे इसी नाम के पड़ने की कथा है।
श्राप और नागों का बिखरना
सर्पों की माता ने श्राप दिया कि वचन तोड़ने वाले सर्प जनमेजय के यज्ञ में भस्म होंगे। कथा उन्हें केवल सर्पों की माता कहती है। परंपरा में उनका नाम कद्रू है।
श्राप का पता चलते ही नाग अलग-अलग दिशाओं में बँट गए। कुछ हिमालय पर तप करने गए। कंबल ने ब्रह्मा की शरण ली। शंखचूड़ मणिपुर गया, कालिय यमुना में, और धृतराष्ट्र प्रयाग। एलापत्रक ब्रह्मलोक गया, और बाकी सर्प कुरुक्षेत्र में तप करने लगे।
ब्रह्मा का बताया उपाय
एलापत्रक ब्रह्मा से पूछता है कि इस श्राप से कैसे बचा जाए। ब्रह्मा उसे महाकालवन जाने को कहते हैं, जहाँ महामाया के समीप देवों के स्वामी महादेव का दिव्य लिंग है, और वहीं आराधना करने की सलाह देते हैं।
कर्कोटक की स्तुति और शिव का वरदान
कर्कोटक को कोई भेजता नहीं। वह अपनी इच्छा से उस लिंग के सामने बैठता है और शिव की स्तुति करने लगता है।
शिव प्रसन्न होते हैं और वरदान देते हैं कि जो नाग धर्म का आचरण करेंगे, उनका विनाश नहीं होगा। कुछ पुनर्कथनों में यह भी जुड़ता है कि क्रूर और विष उगलने वाले सर्पों का नाश होगा।
कथा के कर्कोटक कौन हैं?
कर्कोटक एक नागराज हैं, जिन्हें कद्रू का पुत्र माना जाता है। ब्रह्मांड पुराण कद्रू के हज़ार सर्प-पुत्रों में उनका नाम कंबल, एलापत्र और धृतराष्ट्र के साथ गिनाता है। महाभारत का आदिपर्व सर्प-सत्र के प्रसंग में उन्हें प्रमुख नागों में गिनता है।
महाभारत के वनपर्व की एक अलग कथा में कर्कोटक राजा नल को डसते हैं। परंपरा में वे एक ही नागराज माने जाते हैं, पर कर्कोटेश्वर अध्याय का इस कथा से संबंध नहीं बताया जाता।
स्कन्दपुराण कर्कोटेश्वर महादेव का क्या फल बताता है?
अध्याय की शुरुआत ही लिंग का नाम और उसका फल बताने से होती है: इसके दर्शन से मनुष्य विषों से पीड़ित नहीं होता।
कर्कोटेश्वरसंज्ञं च दशमं विद्धि पार्वति ।
यस्य दर्शनमात्रेण विषैर्नैवाभिभूयते ॥
अर्थ: हे पार्वति, कर्कोटेश्वर नामक लिंग को दसवाँ जानो। इसके दर्शन मात्र से मनुष्य विषों से अभिभूत नहीं होता।
इस लिंग के बाकी जितने फल बताए जाते हैं, वे लोक-मान्यता से आते हैं। नीचे की तालिका में उन्हें पाठ से अलग रखा गया है।
कर्कोटेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें कथा से मेल नहीं खातीं?
कर्कोटेश्वर महादेव की कथा कई जगह जोड़-घटाव के साथ सुनाई जाती है। जिन बातों को सावधानी से लेना चाहिए, वे ये हैं।
| प्रचलित बात | स्कन्दपुराण की कथा में | स्थिति |
|---|---|---|
| "माता उमा" ने सर्पों को श्राप दिया | कथा उन्हें केवल सर्पों की माता कहती है; परंपरा में उनका नाम कद्रू है | कथा से पुष्ट नहीं |
| शिव ने कर्कोटक का आलिंगन किया | शिव प्रसन्न होकर वरदान देते हैं, आलिंगन का वर्णन नहीं है | कथा में नहीं |
| कर्कोटक ने कठोर तपस्या की | वह शिव की स्तुति करता है; तपस्या शब्द अन्य नागों के लिए आता है | कथा में नहीं |
| दर्शन से कालसर्प दोष मिटता है | अध्याय का फल विष-बाधा से रक्षा है; कालसर्प योग बाद की ज्योतिषीय धारणा है | आधुनिक ज्योतिषीय मान्यता |
| पंचमी, चतुर्दशी, रविवार और श्रावण में विशेष महत्व है | ये दिन परंपरा से चले आते हैं | लोक-मान्यता |
| कुल में सर्प-पीड़ा नहीं रहती और वंश बढ़ता है | ये फल "माना जाता है कि" के रूप में कहे जाते हैं | लोक-मान्यता |
आवन्त्यखण्ड का नाग तीर्थ अध्याय नागों को सर्प-सत्र से बचाने का श्रेय आस्तीक को देता है, फिर उन्हें महाकालवन में कुशस्थली के दक्षिण का तीर्थ बताता है। कर्कोटेश्वर अध्याय में बचाव शिव के वरदान से होता है। एक ही श्राप के दो समाधान हैं, इसलिए आस्तीक, वासुकि या उच्चैःश्रवा की शर्त को कर्कोटेश्वर की कथा में नहीं जोड़ना चाहिए।
कर्कोटेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?
जनमेजय का सर्प-सत्र क्या था?
जनमेजय का सर्प-सत्र परीक्षित के पुत्र राजा जनमेजय का वह यज्ञ था, जिसमें सर्पों को मंत्रों से खींचकर अग्नि में आहुत किया जाता था। महाभारत के अनुसार तक्षक के डसने से परीक्षित की मृत्यु हुई थी, इसलिए जनमेजय ने यह यज्ञ किया। आस्तीक के हस्तक्षेप पर यज्ञ रुका।
क्या आज की जगह वही है जिसका पुराण में वर्णन है?
कर्कोटेश्वर महादेव के आज के स्थान की पहचान परंपरा और पाठ के एक संकेत पर टिकी है। ब्रह्मा लिंग को महामाया के समीप बताते हैं, और हरसिद्धि परिसर में महामाया का स्थान बताया जाता है, इसलिए मेल बैठता प्रतीत होता है, पर सिद्ध नहीं है। एक स्थानीय मत कोट मोहल्ले में पुराना मंदिर बताता है।
कर्कोटेश्वर नाम कैसे पड़ा?
कर्कोटेश्वर नाम नागराज कर्कोटक से जुड़ा है, जिसने लिंग के सामने बैठकर शिव की स्तुति की थी। नाम कर्कोटक और ईश्वर से बना है। पुराण के अध्याय का शीर्षक कर्कोटेश्वर और कर्कोटकेश्वर, दोनों रूप देता है, और बोलचाल में छोटा रूप कर्कोटेश्वर ही चलता है।
84 महादेव का वर्णन किस ग्रंथ में मिलता है?
84 महादेव का वर्णन स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में मिलता है। इसमें महाकालवन क्षेत्र के हर लिंग का स्थान, नाम और नाम की व्याख्या करने वाली कथा दी गई है। लेखक नाम समझाने के लिए पुरानी कथाओं को ढालता है, इसीलिए एक ही श्राप दो अध्यायों में अलग बचाव के साथ आता है।
उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में कर्कोटेश्वर दसवें क्यों हैं?
आवन्त्यखण्ड में 84 लिंगों का वर्णन अध्याय-दर-अध्याय है, और कर्कोटेश्वर का अध्याय दसवाँ है। यह स्वर्गद्वारेश्वर (नौवें) और सिद्धेश्वर (ग्यारहवें) के बीच आता है, और बारहवें लोकपालेश्वर हैं। आज की 84 महादेव सूचियाँ भी इसे दसवें स्थान पर रखती हैं।
स्कन्दपुराण में 84 नामों की एक अलग सूची भी है, जिसका क्रम भिन्न है। यात्रा में अध्याय का क्रम माना जाता है, जिसमें कर्कोटेश्वर दसवें हैं।
हरसिद्धि की अपनी परंपरा में यहाँ सती की कोहनी गिरने की मान्यता है, हालाँकि इस शक्तिपीठ की स्थिति पर विद्वानों में मतभेद है। पूरी सूची के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।
कर्कोटेश्वर के बाद 84 महादेव की कथा किस लिंग पर जाती है?
अध्याय-क्रम में अगला लिंग सिद्धेश्वर है, जो ग्यारहवाँ है, और उसके बाद बारहवें लोकपालेश्वर आते हैं। चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य में हर लिंग का अपना अध्याय है, और हर अध्याय में उसके नाम पड़ने की अपनी कथा।
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