अकबर की दीवार और पाँच दरवाजे
उज्जैन पर बाज़ बहादुर (मांडू) का आधिपत्य समाप्त करने के बाद अकबर ने मालवा में मुगल शासन स्थापित किया। अकबर ने उज्जैन की सुरक्षा के लिए शहर के चारों ओर एक दीवार बनवाई। इस दीवार में प्रवेश के लिए पाँच मुख्य द्वार थे: नदी दरवाजा, कालियादेह दरवाजा, सती दरवाजा, देवास दरवाजा और इंदौर दरवाजा।
हर दरवाजे का नाम उसकी दिशा या गंतव्य से था। इंदौर दरवाजा उस तरफ खुलता था जहाँ से इंदौर का रास्ता जाता था। देवास दरवाजा देवास की ओर। नदी दरवाजा क्षिप्रा की तरफ। और सती दरवाजा वह मार्ग जिसके पास सती माता का स्थान था।
यह दीवार आज नहीं है। सदियों में शहर बदला, दीवार गई, दरवाजे गए। लेकिन नाम रहे। आज जो सतीगेट इलाका है, वह उसी ऐतिहासिक पहचान को आगे बढ़ाता है।
एक नज़र में
- मुगलकालीन शहर-दीवार: अकबर के शासनकाल में उज्जैन की सुरक्षा के लिए निर्मित
- पाँच प्रमुख द्वार: नदी दरवाजा, कालियादेह दरवाजा, सती दरवाजा, देवास दरवाजा, इंदौर दरवाजा
- स्रोत: जिला प्रशासन उज्जैन का इतिहास विवरण (ujjain.nic.in)
- 2026 में खोज: सड़क चौड़ीकरण के दौरान सती माता मंदिर में दबा प्राचीन द्वार मिला
- वर्तमान: कंठाल चौराहे से सतीगेट होते हुए छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण जारी; सती माता द्वार का सौंदर्यीकरण प्रस्तावित
- महत्व: बाबा महाकाल की शाही सवारी का मार्ग इसी रास्ते से गुजरता है
1658: सती दरवाजे के पास जो युद्ध हुआ
मुगलकालीन उज्जैन में सती दरवाजा केवल एक प्रवेश-बिंदु नहीं था यह उस शहर के इतिहास के कुछ सबसे तीखे क्षणों का गवाह भी था।
1658 में उज्जैन के पास एक युद्ध हुआ जिसमें औरंगजेब और मुराद ने महाराज जसवंत सिंह (जोधपुर) को हराया जो शाहजहाँ के पुत्र दारा की ओर से लड़ रहे थे। इस युद्ध का वास्तविक स्थान धर्मतपुरा था, जिसे औरंगजेब ने विजय के बाद फ़तेहाबाद नाम दिया। राजा रत्न सिंह (रतलाम), जो इस युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए, उनकी छतरी अभी भी उस स्थल पर खड़ी है।
यह युद्ध उज्जैन की उस शहर-दीवार के काल में हुआ जिसका सती दरवाजा एक हिस्सा था। इतिहास की परतें यहाँ एक दूसरे पर चढ़ी हैं।
मई 2026: दीवार में दबा द्वार निकला
सिंहस्थ 2028 की तैयारियों के तहत कंठाल चौराहे से सतीगेट होते हुए छत्री चौक तक सड़क चौड़ीकरण का काम चल रहा है। इसी काम के दौरान मई 2026 में सती माता मंदिर परिसर में वर्षों से निर्माण सामग्री के नीचे दबा एक प्राचीन द्वार सामने आया।
नगर निगम ने इसे संरक्षित करने की बात कही और पुरातत्व विभाग से ऐतिहासिक महत्व की जाँच कराने की प्रक्रिया शुरू की। [नोट: इस खोज और जाँच की अद्यतन स्थिति प्रकाशन से पहले पुनः verify करें।]
यह इकलौती घटना नहीं है। भारत के पुराने शहरों में जब भी बड़े बुनियादी ढाँचे के काम होते हैं, ऐसी खोजें होती हैं। उज्जैन में जहाँ शहर की उम्र हजारों साल है, वहाँ हर खुदाई एक पुरातात्विक संभावना है।
महाकाल की शाही सवारी और सतीगेट मार्ग
सतीगेट का आज भी एक विशेष धार्मिक महत्व है: बाबा महाकाल की शाही सवारी इसी मार्ग से होकर गुजरती है। यानी यह सड़क केवल एक आवागमन-मार्ग नहीं यह महाकालेश्वरउज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन। के धार्मिक कैलेंडर का हिस्सा है।
इसीलिए नगर निगम आयुक्त ने कंठाल चौराहा से सतीगेट होते हुए छत्री चौक तक चल रहे मार्ग चौड़ीकरण और निर्माण कार्यों में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं दिन के साथ रात्रिकालीन शिफ्ट में भी काम हो रहा है।
सड़क चौड़ीकरण के साथ प्राचीन श्री सती माता द्वार के सौंदर्यीकरण का काम भी प्रस्तावित है। मुख्यमंत्री ने इसके लिए तैयार डिज़ाइन का अवलोकन किया।
सती गेट को उसका पुराना स्वरूप दिया जाना है यानी जो मुगलकालीन पहचान सदियों में दबती गई, उसे एक बार फिर सतह पर लाने की कोशिश हो रही है।
सतीगेट: तब और अब
मुगल काल में सती दरवाजा शहर की सीमा था उससे बाहर जाने का मतलब था उज्जैन की दीवारों के बाहर निकलना। आज सतीगेट एक व्यस्त शहरी मार्ग का नाम है कंठाल, बड़ा सराफा, छत्री चौक, गोपाल मंदिर यह सब एक ही धुरी पर हैं।
लेकिन नाम वही है। और नाम में ही इतिहास है।
सती माता मंदिर परिसर में अभी पुरातत्व जाँच की प्रक्रिया चल रही है मंदिर के पास का प्राचीन द्वार देखने लायक है। आसपास बड़ा सराफा (उज्जैन का जेवर बाजार) और छत्री चौक हैं। महाकालेश्वर की शाही सवारी के दिन इस पूरे मार्ग पर उज्जैन का सबसे बड़ा जनसैलाब होता है।
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