राणोजीराव सिंधिया: वह सरदार जिसने मालवा बदल दिया
राणोजीराव सिंधिया (लगभग 1700–1745) सिंधिया/शिंदे घराने के संस्थापक थे। उनके पूर्वज बहमनी सल्तनत के अधीन शिलेदार (घुड़सवार) थे। राणोजीराव ने युवावस्था में पेशवा बालाजी विश्वनाथ की सेवा में प्रवेश किया। पेशवा के एक दूत रामचंद्रबाबा सुखतनकर ने उनकी प्रतिभा पहचानी और उन्हें पेशवा के पुत्र बाजीराव प्रथम का व्यक्तिगत सेवक नियुक्त कराया।
बाजीराव प्रथम के पेशवा बनने के बाद राणोजीराव की स्थिति तेजी से बदली। उन्होंने पालखेड़, बुंदेलखंड, मंदसौर और बेसिन के अभियानों में मराठा सेना का नेतृत्व किया। 1726 में उन्हें मालवा में मराठा विजय का दायित्व सौंपा गया। 1731 में पेशवा बाजीराव ने उन्हें मालवा का औपचारिक सूबेदार नियुक्त किया। उज्जैन उनकी राजधानी बनी।
उज्जैन में उन्होंने केवल प्रशासन नहीं चलाया। 1732 में श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर के पुनर्निर्माण का काम उन्हीं के आदेश पर शुरू हुआ। हर्षिद्धि मंदिर, सिद्धवट घाट, रामघाट और मंगलनाथ - इन सभी का जीर्णोद्धार राणोजीराव के कार्यकाल में हुआ।
उनका निधन 3 जुलाई 1745 को शुजालपुर, मालवा में हुआ - वे लगभग 44-45 वर्ष के थे। [नोट: दस्तावेज़ में 19 जुलाई और राणोगंज गांव का उल्लेख है; Wikipedia के अनुसार तिथि 3 जुलाई और स्थान शुजालपुर है - दोनों स्रोतों में अंतर है। प्रकाशन से पहले पुनः पुष्टि करें।]
एक नज़र में
- स्मारक: राणोजीराव सिंधिया (सिंधिया/शिंदे वंश के संस्थापक) की स्मृति में
- निर्माण: उनके पुत्र जयप्पाजी राव सिंधिया ने कराया
- स्थान: रामघाट, क्षिप्रा नदी तट, उज्जैन
- वास्तुकला: राजस्थानी-मराठा शैली
- सौंदर्यीकरण: मध्य प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम द्वारा लगभग 78 करोड़ रुपए की परियोजना प्रस्तावित
छत्री का निर्माण: एक पुत्र की श्रद्धांजलि
राणोजीराव के निधन के बाद उनके पुत्र जयप्पाजी राव सिंधिया ने पिता की अस्थियों का एक भाग रामघाट पर क्षिप्रा में विसर्जित किया। यहीं उन्होंने यह स्मारक-छत्री बनवाई।
रामघाट इसके लिए यादृच्छिक चुनाव नहीं था। मान्यता है कि त्रेतायुग में श्रीराम ने यहाँ अपने पिता राजा दशरथ का तर्पण किया था। सदियों से राजघरानों और क्षत्रिय वंशों के लिए रामघाट पर अस्थि-विसर्जन और पितृ-तर्पण का विशेष स्थान रहा है। राणोजीराव की अस्थियों का यहाँ विसर्जन इसी परंपरा के अनुसार था - उज्जैन उनकी राजधानी थी, रामघाट उनका आत्मिक नाता।
वास्तुकला: दो शैलियों का मेल
छत्री की बनावट में राजस्थानी और मराठा स्थापत्य दोनों की छाप है। गुंबदों का स्वरूप, पत्थरों पर बारीक नक्काशी और सजावटी छतरियां - यह शैली उस दौर की मराठा निर्माण-परंपरा के अनुरूप है जो मुगल, राजपूत और दक्खनी प्रभावों को एकसाथ पचाती थी।
सिंधिया वंश की छत्रियाँ गवालियर, उज्जैन और शिवपुरी में भी हैं। गवालियर की छत्रियाँ पीले और गुलाबी बलुआ पत्थर से बनी हैं। उज्जैन की इस छत्री का स्थान क्षिप्रा के किनारे होने के कारण इसे एक अलग दृश्य-आकर्षण मिलता है।
रामघाट का आध्यात्मिक वातावरण
रामघाट उज्जैन के सबसे सक्रिय धार्मिक घाटों में से एक है। सुबह और शाम की आरती, क्षिप्रा में स्नान करने वाले श्रद्धालु, घाट पर बैठे पंडित-पुजारी - यह दृश्य प्रतिदिन का है।
छत्री इस वातावरण का हिस्सा है। यहाँ आने वाले अधिकांश लोग रामघाट की यात्रा के साथ छत्री भी देखते हैं। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से नजदीकी होने के कारण इस पूरे क्षेत्र में श्रद्धालुओं की निरंतर आवाजाही रहती है।
वर्तमान सौंदर्यीकरण परियोजना
मध्य प्रदेश राज्य पर्यटन विकास निगम ने छत्री परिसर के संरक्षण और सौंदर्यीकरण के लिए दो टेंडर जारी किए हैं - 32.34 करोड़ और 45.66 करोड़ रुपए के, कुल लगभग 78 करोड़ रुपए। इसी योजना में श्रीराम जनार्दन मंदिर, चौबीस खंबा और चामुंडा माता मंदिर का सौंदर्यीकरण भी शामिल है।
अभी छत्री की मुख्य प्रवेश रामघाट मार्ग स्थित रामानुज कोट के सामने से है। नई योजना में रामघाट से सीधी प्रवेश बनाई जाएगी, जिससे घाट से छत्री तक आना आसान होगा।
आसपास क्या देखें
रामघाट क्षेत्र में छत्री के अलावा कई और स्थल हैं जो एक ही यात्रा में देखे जा सकते हैं:
- श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर: राणोजीराव ने जिसका पुनर्निर्माण 1732 में शुरू कराया था - मूल कारण जो उन्हें उज्जैन से जोड़ता है।
- रामघाट: छत्री से सीधे सटा हुआ; शाम की आरती के समय का माहौल अलग होता है।
- चौबीस खंबा मंदिर: सौंदर्यीकरण परियोजना का हिस्सा; छत्री से पैदल दूरी पर।
- हर्षिद्धि मंदिर: राणोजीराव द्वारा जीर्णोद्धार - सिंधिया वंश के उज्जैन-संपर्क का एक और साक्ष्य।
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