हरसिद्धि मंदिर कौन सा शक्तिपीठ है?
शक्तिपीठों की कुल संख्या इस्तेमाल किए जाने वाले ग्रंथ पर निर्भर है। शिव चरित्र और देवी भागवत 51 मानते हैं, तंत्रचूडामणि और मार्कंडेय पुराण 52। उज्जैन का हरसिद्धि पीठ दोनों परंपराओं में है और इसे आमतौर पर 13वां शक्तिपीठ गिना जाता है, हालांकि यह क्रमांक ग्रंथों में स्थिर नहीं है।
पीठ निर्णय तंत्र (श्लोक 16) में इस पीठ का नाम स्पष्ट है:
पीठ निर्णय तंत्र, श्लोक 16
"उज्जयिन्यां कूर्परञ्च माङ्गल्य कपिलाम्बरः / भैरवः सिद्धिदः साक्षाद्देवी मङ्गलचण्डिका"
अर्थ: उज्जयिनी में मेरी कोहनी (कूर्पर) गिरी। कपिलांबर भैरव हैं जो साक्षात सिद्धि देते हैं, और देवी मंगल चंडिका हैं।
उज्जैन में देवी सती के 2 अंग गिरे थे, इसलिए यहां 2 शक्तिपीठ हैं। हरसिद्धि में कोहनी गिरी, और भैरवपर्वत पर स्थित गढ़कालिका (अवंति पीठ) में ऊपरी होंठ। यही कारण है कि उज्जैन को महाकाल और महाकाली दोनों का शहर कहा जाता है।
हरसिद्धि नाम कहां से आया?
स्कंद पुराण के अवंती महात्म्य में एक कथा है कि चंड और प्रचंड नाम के 2 राक्षस कैलाश पर पहुंचे और नंदी को हरा दिया। भगवान शिव ने तब चंडी का आह्वान किया। देवी ने दोनों राक्षसों का वध किया। शिव ने घोषित किया: "हरसिद्धि तो लोके नाम्ना ख्यातिं गमिष्यति" यानी जो हर काम में सिद्धि देती हैं, वे हरसिद्धि नाम से जानी जाएंगी।
चंड और मुंड का वध करने से देवी को चामुंडा भी कहा जाता है। तांत्रिक परंपरा में मंगल चंडिका और हरसिद्धि एक ही देवी के अलग-अलग नाम हैं।
मंदिर का इतिहास – मराठाओं से पहले और बाद
मंदिर का स्थान पुराना है। INTACH (भारतीय राष्ट्रीय ट्रस्ट) के अनुसार मूल मंदिर 10वीं से 14वीं शताब्दी के परमार काल का है। परमार वंश के राजाओं की कुलदेवी भी हरसिद्धि मानी जाती हैं। राजा विक्रमादित्य से संबंध स्थानीय मान्यता और भक्ति साहित्य में है, लेकिन कोई दिनांकित शिलालेख इसे प्रमाणित नहीं करता।
वर्तमान ढांचा रानोजी राव शिंदे (सिंधिया) के काल का है। उन्होंने 1726 में मालवा जीतने के बाद 1731 में उज्जैन को अपनी राजधानी बनाई और इसके बाद महाकालेश्वरउज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन।, हरसिद्धि, राम घाट, मंगलनाथ सहित कई मंदिरों का पुनर्निर्माण कराया। 2 दीप स्तंभ भी इसी मराठाकाल की देन हैं।
कई पर्यटन वेबसाइटें लिखती हैं कि मंदिर 1447 में मराठाओं ने बनाया। यह संभव नहीं क्योंकि मराठे उज्जैन 1726 से पहले पहुंचे ही नहीं। INTACH बोर्ड के अनुसार "1447" का संदर्भ मंदिर के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक प्राचीन बावड़ी (सीढ़ीनुमा कुएं) के शिलालेख का है, मंदिर के निर्माण का नहीं।
| कालखंड | घटना |
|---|---|
| पौराणिक काल | सती की कोहनी यहां गिरी, शक्तिपीठ की स्थापना |
| 10वीं–14वीं शताब्दी | मूल मंदिर, परमार काल |
| 1447 (शिलालेख) | बावड़ी का शिलालेख, मंदिर का नहीं |
| 1731 के बाद | रानोजी शिंदे द्वारा पुनर्निर्माण, 2 दीप स्तंभ |
| वर्तमान | नित्य पूजा, नवरात्रि में दीपमालिका |
राजा विक्रमादित्य और हरसिद्धि माता
हरसिद्धि माता राजा विक्रमादित्य की आराध्य देवी थीं। भक्ति परंपरा में एक कथा है कि विक्रमादित्य ने 11 बार अपना सिर माता को अर्पित किया और हर बार माता ने उन्हें जीवित किया। 12वीं बार सिर वापस नहीं मिला। यह मान्यता भक्ति साहित्य और मौखिक परंपरा में है; कोई दिनांकित पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिला है।
परमार वंश के राजा भी हरसिद्धि को कुलदेवी मानते थे। इस कारण उज्जैन में इस मंदिर का महत्व सिर्फ धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक इतिहास से भी जुड़ा है।
मंदिर की वास्तुकला और परिसर
मंदिर पूर्व दिशा में है, मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व की ओर। 4 दिशाओं में 4 द्वार हैं। गर्भगृह के ऊपर नागर शैली का विमान है जिसके शीर्ष पर आमलक और कलश हैं। मंडप के विमान पिरामिडनुमा हैं, यह शैली मराठा स्थापत्य की पहचान है।
गर्भगृह में माता हरसिद्धि (महाकाली) के दोनों तरफ महालक्ष्मी और महासरस्वती की मूर्तियां हैं। देवी अन्नपूर्णा की मूर्ति गहरे सिंदूरी रंग में रंगी हुई है। गर्भगृह के पास श्री यंत्र उत्कीर्ण पत्थर स्थापित है, जो दुर्गा के 9 रूपों का प्रतीक माना जाता है। मंडप की छत पर 51 शक्तिपीठों और यंत्रों के चित्र बने हैं।
परिसर में और क्या है:
- चिंताहरण गणेश मंदिर
- आदि शक्ति महामाया मंदिर (भूमिगत, सीढ़ियों से नीचे)
- कर्कोटेश्वर महादेव (भूमिगत, कालसर्प दोष निवारण के लिए प्रसिद्ध)
- वरसिद्धि माता मंदिर
- 1447 के शिलालेख वाली प्राचीन बावड़ी (दक्षिण-पूर्व)
- जूता स्टैंड और परिसर के बाहर छोटी दुकानें
दीप स्तंभ – 51 फीट ऊंचे, एक हजार से ज्यादा दीपक
मंदिर के सामने 2 दीप स्तंभ हैं, हर एक लगभग 51 फीट ऊंचा। यह मराठाकालीन कला का नमूना है। दोनों स्तंभों पर मिलाकर एक हजार से अधिक दीपक लगे हैं। जब ये सब एकसाथ जलते हैं तो पूरा परिसर रोशन हो जाता है।
दीप स्तंभ सिर्फ नवरात्रि में नहीं जलते। शाम की आरती में रोज इन पर दीपक जलाए जाते हैं। नवरात्रि में सभी 9 रातों को पूर्ण प्रज्वलन होता है, और यही सबसे बड़ा आकर्षण है।
अष्टमी और नवमी पर शाम होते ही लाइन बहुत लंबी हो जाती है। दीप स्तंभ का पूर्ण प्रज्वलन करीब 7–7:30 बजे होता है। अगर आप दर्शन और दीपमालिका दोनों एक साथ चाहते हैं तो 6:30–6:45 बजे परिसर में आ जाएं। सुबह 5–7 बजे के बीच भीड़ कम रहती है और दर्शन करीब से होते हैं।
नवरात्रि और अन्य पर्व
नवरात्रि हरसिद्धि मंदिर का सबसे बड़ा पर्व है। साल में 2 बार मुख्य नवरात्रि होती है: चैत्र नवरात्रि (मार्च-अप्रैल) और शारदीय नवरात्रि (सितंबर-अक्टूबर)। इनके अलावा आषाढ़ की गुप्त नवरात्रि भी यहां मनाई जाती है।
दिवाली, महाशिवरात्रि और होली पर भी विशेष आयोजन होते हैं। हर 12 साल पर उज्जैन में सिंहस्थ कुंभ मेला लगता है, अगला 2028 में है। उस दौरान शाक्त संप्रदाय के साधु-संत हरसिद्धि मंदिर को विशेष महत्व देते हैं।
मंदिर में दर्शन – व्यावहारिक जानकारी
| जानकारी | विवरण |
|---|---|
| स्थान | राम घाटउज्जैन का प्रमुख राम घाट जहाँ मुख्य स्नान होता है। के पास, महाकालेश्वर से 600 मीटर पश्चिम |
| दर्शन समय | सुबह 5:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक |
| सुबह की आरती | 7:00–8:00 बजे |
| शाम की आरती | 6:00–7:00 बजे (दीप स्तंभ प्रज्वलन के साथ) |
| प्रवेश शुल्क | निःशुल्क |
| दीप स्तंभ ऊंचाई | लगभग 51 फीट (प्रत्येक) |
| दीपक संख्या | 1,000+ (सटीक संख्या स्रोतों में अलग-अलग) |
| फोटोग्राफी | बाहरी परिसर में ठीक है; गर्भगृह में प्रतिबंधित |
| वेशभूषा | मर्यादित पोशाक; जूते बाहर उतारने होंगे |
| पास के स्थल | महाकालेश्वर (600 मीटर), राम घाट (पैदल दूरी), गढ़कालिका मंदिर |
कैसे पहुंचें हरसिद्धि मंदिर?
मंदिर उज्जैन के पुराने शहर में है। उज्जैन जंक्शन से करीब 1.6–2 किमी दूर। महाकालेश्वर से 600 मीटर, पैदल 7–8 मिनट।
सुबह 5 बजे महाकालेश्वर की भस्म आरती से शुरू करें, फिर 7–8 बजे हरसिद्धि माता के दर्शन करें जब भीड़ कम हो। दोपहर में गढ़कालिका मंदिर जाएं जो 5 किमी दूर है। शाम को वापस हरसिद्धि आएं और दीप स्तंभ का प्रज्वलन देखें।
उज्जैन के 2 शक्तिपीठ: हरसिद्धि और गढ़कालिका में फर्क
| पहलू | हरसिद्धि मंदिर | गढ़कालिका मंदिर (अवंति पीठ) |
|---|---|---|
| सती का अंग | कोहनी (कूर्पर) | ऊपरी होंठ (ओष्ठ) |
| देवी का नाम | मंगल चंडिका | अवंती / गढ़कालिका |
| भैरव | कपिलांबर | लंबकर्ण |
| स्थान | राम घाट के पास, शहर के बीच | भैरवपर्वत, शहर से करीब 5 किमी |
| मराठाकाल से संबंध | रानोजी शिंदे द्वारा पुनर्निर्माण | कालिदास की आराध्य देवी माना जाता है |
किसके लिए और कब जाना सही है
इनके लिए खास जगह
- 51 शक्तिपीठ यात्री – यह 13वां शक्तिपीठ है, यात्रा की सूची में अनिवार्य।
- नवरात्रि तीर्थयात्री – सभी 9 रातों को दीप स्तंभ का पूर्ण प्रज्वलन होता है।
- उज्जैन पहली बार आने वाले – महाकालेश्वर के बाद सबसे जरूरी पड़ाव।
- तांत्रिक और शाक्त परंपरा के साधक – श्री यंत्र और मंगल चंडिका उपासना यहां की पहचान है।
इन्हें अलग समय चुनना चाहिए
- शांत दर्शन चाहने वाले – नवरात्रि की अष्टमी-नवमी शाम को भीड़ बहुत ज्यादा रहती है। सुबह 5–7 बजे आएं।
- बच्चों के साथ – पीक समय पर गर्भगृह तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है। सोमवार सुबह तुलनात्मक रूप से शांत रहता है।
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