गुहेश्वर महादेव उज्जैन क्या है?

गुहेश्वर महादेव उज्जैन के 84 महादेवों में दूसरा शिवलिंग है, जिसकी कथा स्कन्दपुराण के आवन्त्यखण्ड में चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य के दूसरे अध्याय में है। पुराण के अनुसार यह लिंग महाकालवन की एक गुहा में सात कल्पों से विद्यमान है, और मंकणक ऋषि के दर्शन के बाद इसका नाम गुहेश्वर पड़ा।

हिंदी की कई सूचियों में इसे "लिंग गुहेश्वर" भी लिखा जाता है। यह अलग नाम नहीं है, सूचियों के "(2) लिंग गुहेश्वर महादेव" जैसे वाक्यांश से चल पड़ा रूप है।

स्थानीय विवरण इस मंदिर को रामघाट पर पिशाचमुक्तेश्वर के पास बताते हैं, जहाँ लिंग एक सुरंगनुमा जगह के भीतर माना जाता है।

संक्षेप में जानें

  • मंकणक ऋषि को अपने शरीर से शाकरस निकलने पर गर्व हुआ, और उनके नाच से जगत में उथल-पुथल मच गई।
  • शिव ब्राह्मण का वेश धरकर आए और अपने अँगूठे से भस्म गिराकर ऋषि को चुप कराया।
  • लज्जित ऋषि को शिव ने महाकालवन भेजा, और लिंग का नाम देवताओं ने आकाश से घोषित किया।
  • यही कथा महाभारत में भी है, पर वहाँ स्थान सरस्वती का तट है।

गुहेश्वर महादेव से जुड़े मुख्य तथ्य क्या हैं?

विषय जानकारी
नाम का अर्थ गुहा (गुफा) के ईश्वर
देवता शिव, लिंग रूप में
मूल ग्रंथ स्कन्दपुराण 5.2.2 (आवन्त्यखण्ड, चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य, अध्याय 2)
अध्याय में श्लोक 48
84 महादेव में क्रम दूसरा
कथा के ऋषि मंकणक
पौराणिक क्षेत्र महाकालवन
भस्म अँगूठे से झरी थी

कई जगह लिखा मिलता है कि शिव ने अँगूठा दबाकर अँगुली के सिरे से भस्म निकाली। स्कन्दपुराण और महाभारत, दोनों में क्रम उलटा है: शिव अपनी अँगुली के अग्रभाग से अपने अँगूठे पर चोट करते हैं, और हिम जैसी सफ़ेद भस्म अँगूठे से झरने लगती है।

स्कन्दपुराण में गुहेश्वर महादेव की कथा क्या है?

गुहेश्वर महादेव का अध्याय रुद्र के कथन से खुलता है। पहले ही श्लोक में वे इसे "द्वितीयं पापनाशनम्" कहते हैं, यानी पापों का नाश करने वाला दूसरा लिंग, जिसके दर्शन मात्र से उत्तम सिद्धि मिलती है। फिर वे बताते हैं कि यह नाम कैसे पड़ा।

देवदारु वन का तपस्वी

रथन्तर कल्प में देवदारु वन में मंकणक नाम के ऋषि रहते थे। वे वेद और वेदांग के पारंगत थे और योग में लीन रहते थे।

सिद्धि की कामना से उन्होंने हज़ारों वर्ष तप किया।

खून की जगह शाकरस और गर्व का नाच

एक दिन कुशा की नोक से उनका हाथ छिल गया। घाव से रक्त की जगह शाकरस (साग-पत्तियों का रस) निकला।

मंकणक इसे अपनी सिद्धि का प्रमाण मान बैठे। गर्व से बोले कि उनके समान कोई ब्राह्मण नहीं, और खुशी में नाचने लगे। उनके तेज से सारा चराचर जगत भी डोलने और नाचने लगा, और वेदपाठ व यज्ञ-कर्म रुक गए।

देवताओं की पुकार

ब्रह्मा और विष्णु को आगे करके देवता शिव के पास पहुँचे। उन्होंने जो हाल सुनाया, वह प्रलय जैसा था: पर्वत जड़ से हिल रहे हैं, मेघ बिखर गए हैं, शिखर ढह रहे हैं और पृथ्वी पीड़ित है।

महानदियाँ सिकुड़कर मात्र जलधारा रह गई हैं, और ग्रह अपनी कक्षाओं से हट गए हैं।

ब्राह्मण के वेश में शिव

शिव ब्राह्मण का रूप धरकर मंकणक के पास आए। उन्होंने कहा कि ऐसा नाच मुनि-धर्म के विरुद्ध है और तप से गिराता है।

मंकणक ने जवाब में अपने हाथ का शाकरस दिखाया। शिव हँसे, अँगुली के अग्रभाग से अपने अँगूठे पर चोट की, और अँगूठे से भस्म गिरने लगी। फिर बोले: देखो, मेरे अँगूठे से भस्म गिर रही है, फिर भी मैं न घमंड करता हूँ, न नाचता हूँ।

लज्जा और वरदान

मंकणक लज्जित हुए और हाथ जोड़कर बोले कि शिव के सिवा वे किसी और देवता को नहीं मानते। क्षमा माँगते हुए उन्होंने माना कि इस नाच में उनका बरसों का संचित पुण्य नष्ट हो गया।

शिव उनके इस बोध से प्रसन्न हुए और वर माँगने को कहा (स्कन्दपुराण 5.2.2.29):

ज्ञानेनानेन विप्रेंद्र कं ते कामं करोम्यहम्

अर्थ: हे विप्रश्रेष्ठ, तुम्हारे इस ज्ञान से प्रसन्न होकर मैं तुम्हारी कौन-सी कामना पूरी करूँ?

महाकालवन की गुहा

मंकणक ने वर में यही माँगा कि उनके तप की हानि रुके। शिव ने कहा, तुम्हारा तप बढ़े, महाकालवन जाओ, और वहाँ का पता यों बताया (स्कन्दपुराण 5.2.2.32):

तत्रास्ते सर्वदा पुण्या सप्तकल्पोद्भवा गुहा ।
पिशाचेश्वरदेवस्य उत्तरेण व्यवस्थिता ॥

अर्थ: वहाँ सदा पुण्य देने वाली, सात कल्पों से विद्यमान एक गुहा है, जो पिशाचेश्वर देव के उत्तर में स्थित है। अगले श्लोक के अनुसार उसी गुहा में सात कल्पों से एक शुभ लिंग है।

शिव के अनुसार उस लिंग के दर्शन से तप बढ़ता है, और काम, क्रोध, लोभ, मोह व ईर्ष्या से उपजे पाप निष्फल हो जाते हैं। मंकणक वहाँ पहुँचे, लिंग के दर्शन किए और बारह आदित्यों जितने तेजस्वी हो गए।

आकाश से हुआ नामकरण

अगस्त्येश्वर के उलट, इस लिंग का नाम देवताओं ने रखा। आकाश से उन्होंने घोषणा की कि गुहा से प्रकट और गुप्त रखने योग्य इस लिंग के दर्शन मंकणक ने किए हैं, इसलिए यह पृथ्वी पर गुहेश्वर कहलाएगा।

मंकणक ने वहीं आश्रम बनाया और तप जारी रखा।

महाभारत की मंकणक कथा से गुहेश्वर की कथा कितनी अलग है?

मंकणक की कथा महाभारत के शल्यपर्व में बलराम की सरस्वती-तीर्थयात्रा के प्रसंग में आती है। वनपर्व (अध्याय 83) की तीर्थयात्रा वाली सूची में भी यही कथा सप्तसारस्वत तीर्थ के साथ संक्षेप में मिलती है।

दोनों कथाओं का ढाँचा लगभग एक है, फर्क स्थान और अंत में है। स्कन्दपुराण ने महाभारत की कथा उठाकर उसे उज्जैन के महाकालवन से जोड़ दिया।

पहलू महाभारत (शल्यपर्व) स्कन्दपुराण 5.2.2
स्थान सरस्वती तट का सप्तसारस्वत तीर्थ देवदारु वन में तप, फिर महाकालवन
मंकणक का परिचय वायु और सुकन्या के पुत्र, बाल-ब्रह्मचारी; उनसे सात मरुत् गणों का जन्म वेद-वेदांग के पारंगत योगी; जन्म-कथा नहीं
देवताओं की प्रार्थना देवता महादेव से प्रार्थना करते हैं ब्रह्मा और विष्णु के साथ देवता, प्रलय जैसे लक्षणों का विस्तार
शिव का रूप शिव स्वयं आते हैं शिव ब्राह्मण के वेश में आते हैं
अंत शिव तप-वृद्धि का वर देकर सप्तसारस्वत में रहने का वचन देते हैं ऋषि को गुहा के लिंग के दर्शन के लिए भेजा जाता है, लिंग गुहेश्वर कहलाता है
फल सप्तसारस्वत में शिव-पूजा करने वाले को मृत्यु के बाद सारस्वत लोक पितरों को ब्रह्मलोक, कुल के इक्कीस सदस्यों का उद्धार

स्कन्दपुराण में गुहेश्वर महादेव के दर्शन का क्या फल बताया गया है?

गुहेश्वर अध्याय की फलश्रुति ये फल गिनाती है:

  1. भक्ति से दर्शन करने वाले के धर्म-कार्य और तप में कभी विघ्न नहीं आता।
  2. अष्टमी या चतुर्दशी को दर्शन करने वाले के पितर ब्रह्मलोक जाते हैं।
  3. बड़े प्रयत्न से यहाँ आकर दर्शन करने वाला अपना और अपने कुल के इक्कीस सदस्यों का उद्धार करता है।
  4. हज़ारों पाप करके भी दर्शन करने वाला महेश्वर के लोक जाता है, और ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी व गुरुपत्नी-गमन जैसे महापाप भी नष्ट होते हैं।
  5. लिंग के स्पर्श मात्र से करोड़ों जन्मों का अशुभ नष्ट होता है।
  6. इस कथा को सुनने और सुनाने से भी पाप नष्ट होते हैं।

अष्टमी और चतुर्दशी का फल दर्शन करने वाले के पितरों को मिलता है, यह बात अक्सर छूट जाती है।

गुहेश्वर महादेव की कौन-सी प्रचलित बातें पुराण से मेल नहीं खातीं?

गुहेश्वर महादेव की कथा कई रूपों में सुनाई जाती है। इनमें से जो बातें स्कन्दपुराण के पाठ से अलग हैं, वे यहाँ हैं।

प्रचलित बात स्कन्दपुराण में स्थिति
गुहा "सप्तकालपोद्भवा" है, लिंग "सप्तकुल" में उत्पन्न श्लोक 32 और 33 में शब्द "सप्तकल्पोद्भवा" है, यानी सात कल्पों से विद्यमान पाठ-दोष
कथा में "पर्वत पुत्र विद्ध" नाम का कोई पात्र है श्लोक 5 में "विद्धस्य पर्वतात्मजे" है: शिव पार्वती को "हे पर्वतपुत्री" कहकर बताते हैं कि ऋषि का हाथ छिदा पाठ-दोष
नदियाँ उलटी बहने लगीं महानदियाँ सिकुड़कर मात्र जलधारा रह गईं कथा से अलग
ग्रह उलटे घूमने लगे ग्रह अपनी कक्षाओं से हट गए कथा से अलग
गुहा वाला श्लोक आज की सुरंग का वर्णन है यह मंकणक को दिया गया शिव का निर्देश है गलत संदर्भ
श्रावण मास का महत्व पुराण में लिखा है अध्याय में श्रावण या सोमवार का उल्लेख नहीं लोक-परंपरा
अहंकार-नाश फलश्रुति का वचन है फलश्रुति में यह शब्द नहीं, यह कथा का संदेश है कथा का संदेश
84 महादेव में पहले महाकालेश्वरउज्जैन के प्रसिद्ध महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के दर्शन। हैं पहले अगस्त्येश्वर हैं; महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग के रूप में अलग पूज्य हैं क्रम-भूल
पिशाचमुक्तेश्वर 84 में तीसरे हैं पिशाचेश्वर 68वें हैं; तीसरे ढुण्ढेश्वर हैं क्रम-भूल
मंदिर हज़ारों वर्ष पुराना है सात कल्प वाली बात धार्मिक कथन है, भवन की आयु नहीं अप्रमाणित
इक्कीस पीढ़ियों वाला फल अकेले गुहेश्वर का नहीं

चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य में ऐसी फलश्रुति बार-बार आती है। अध्याय 22 (कर्कटेश्वर) में भी अष्टमी और चतुर्दशी के दर्शन से इक्कीस पीढ़ियों का फल है, और अध्याय 68 (पिशाचेश्वर) में स्पर्श से सात पीढ़ियों के पवित्र होने की बात है।

गुहेश्वर महादेव के बारे में लोग और क्या पूछते हैं?

क्या गुहेश्वर का लिंग सच में किसी गुफा या सुरंग में है?

गुहेश्वर महादेव के बारे में स्कन्दपुराण कहता है कि लिंग महाकालवन में पिशाचेश्वर के उत्तर की एक गुहा में है। आज का मंदिर स्थानीय विवरणों में सुरंग के भीतर बताया जाता है। पुराण का गुहा वाला कथन शिव का निर्देश है, इसलिए दोनों को जोड़ना परंपरा पर आधारित पहचान है।

क्या गुहेश्वर और नेपाल की गुह्येश्वरी एक ही हैं?

नहीं। गुहेश्वर महादेव उज्जैन का शिवलिंग है, जबकि काठमांडू की गुह्येश्वरी एक अलग शक्तिपीठ है। इसीलिए उज्जैन के लिंग को "गुह्येश्वर" लिखने से भ्रम होता है। स्कन्दपुराण के अर्बुदखण्ड के अध्याय 56 में भी "गुहेश्वर" नाम का अलग तीर्थ है, जिसका इस लिंग से संबंध नहीं।

गुहेश्वर की कथा वाला पुराण-भाग कितना पुराना है?

गुहेश्वर महादेव की कथा जिस चतुरशीतिलिङ्गमाहात्म्य में है, वह स्कन्दपुराण के लखनऊ (नवलकिशोर) संस्करण में नहीं मिलता, और नारदपुराण में दी गई स्कन्दपुराण की विषय-सूची भी इसे नहीं गिनाती। इससे संकेत मिलता है कि 84 लिंगों वाला यह भाग स्कन्दपुराण के मूल पाठ से काफ़ी बाद जुड़ा।

मूल स्कन्दपुराण की सबसे पुरानी ज्ञात ताड़पत्र पांडुलिपि नेपाल से मिली है और उस पर 810 ई. की तिथि है। प्रचलित खण्डों वाला स्कन्दपुराण उसके बहुत बाद तक बढ़ता रहा।

84 महादेव में गुहेश्वर से ठीक पहले और बाद कौन-से लिंग हैं?

स्कन्दपुराण के क्रम में गुहेश्वर महादेव से पहले अगस्त्येश्वर (पहला) और बाद में ढुण्ढेश्वर (तीसरा) हैं। उसके बाद डमरुकेश्वर, अनादिकल्पेश्वर और स्वर्णज्वालेश्वर आते हैं। अवन्तीक्षेत्रमाहात्म्य के अध्याय 70 की तीर्थ-सूची भी यही क्रम देती है।

उज्जैन की 84 महादेव परंपरा में गुहेश्वर क्यों खास है?

स्थानीय परंपरा में 84 महादेव की परिक्रमा और अर्चना खासकर श्रावण मास में होती है, और अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) में भी यह परिक्रमा की जाती है। इस क्रम में गुहेश्वर दूसरा पड़ाव है, अगस्त्येश्वर के ठीक बाद, और श्रावण से इसका जुड़ाव इसी परिक्रमा के रास्ते आता है।

84 लिंगों की पूरी सूची के लिए उज्जैन के 84 महादेव मंदिरों की संपूर्ण परिक्रमा गाइड देखें।

पुराण पहले तीन लिंगों को कहाँ रखता है?

स्कन्दपुराण पहले तीन लिंगों को एक ही ठिकाने के आसपास रखता है। अगस्त्येश्वर पिशाच तीर्थ के दक्षिणी भाग में बताए गए हैं, गुहेश्वर पिशाचेश्वर के उत्तर में, और अध्याय 3 के ढुण्ढेश्वर पिशाचेश्वर के समीप।

यानी 84 महादेव की सूची एक ही पवित्र स्थल के चारों ओर से शुरू होती है। ढुण्ढेश्वर को यह नाम किस कथा से मिला, वह अगले अध्याय में है।